पटना :- बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुए करीब एक दशक बीत चुका है. राज्य सरकार ने पांच अप्रैल 2016 को इसे ड्राई स्टेट घोषित किया था. शराब के निर्माण और बिक्री पर पूरी पाबंदी के बाद भी नशे के दूसरे विकल्प बड़ी चुनौती हैं. विशेषकर तंबाकू और खैनी का सेवन करने वाले लोगों की संख्या में अप्रत्याशित रूप से काफी इजाफा दर्ज किया गया है.
ग्रामीण और शहरी खर्च
हालिया घरेलू उपभोग खर्च के आंकड़ों के मुताबिक बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति तंबाकू या खैनी उत्पादों पर हर 30 दिनों में करीब ₹110.81 खर्च किए जाते हैं. इसके विपरीत शहरी क्षेत्रों में यही मासिक आंकड़ा ₹100.87 दर्ज किया गया है. यह आंकड़े स्पष्ट दिखाते हैं कि आम जनता का बड़ा पैसा इस जानलेवा व्यसन पर लगातार नष्ट हो रहा है.
तंबाकू पर बढ़ता व्यय
खर्च के इन नवीनतम सरकारी आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण करने पर एक बहुत बड़ा अंतर सामने आता है. बिहार के शहरी निवासियों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग प्रति व्यक्ति औसतन ₹9.94 अधिक राशि तंबाकू पर गंवा रहे हैं. यह अंतर पूरी तरह प्रमाणित करता है कि ग्रामीण परिवेश में खैनी की लत अत्यधिक गहरी हो चुकी है.
आबादी पर व्यसन का साया
बिहार की एक बहुत बड़ी आबादी इस जानलेवा लत की गिरफ्त में पूरी तरह समा चुकी है. आंकड़ों के अनुसार राज्य के करीब 45.8% पुरुष नियमित रूप से खैनी या अन्य तंबाकू उत्पादों का उपभोग करते हैं. सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर नशा मुक्ति अभियान चलाने के बाद भी दैनिक स्तर पर इसकी मांग और भारी खपत लगातार बनी हुई है.
प्रमुख जिलों में उत्पादन
शराब पर सख्त रोक के बावजूद तंबाकू का उत्पादन और खपत बिहार के ग्रामीण अर्थतंत्र एवं सामाजिक जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बना हुआ है. राज्य के मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, वैशाली और दरभंगा जैसे प्रमुख जिलों में किसान बड़े पैमाने पर खैनी जैसी फसलों की व्यावसायिक खेती करते हैं. यह खेती स्थानीय स्तर पर तंबाकू कारोबार को लगातार मजबूती प्रदान करती है. लेकिन समस्तीपुर का नजारा अलग है.
समस्तीपुर के छोटे किसानों का मोह भंग
तंबाकू की खेती के लिए समस्तीपुर की मिट्टी सूबे में अलग है. यहां उपजने वाले सरैसा तंबाकू में तो यह जिला देश मे अव्वल है. अब बड़े पैमाने पर तंबाकू उपजाने वाले इस जिले में इसकी खेती सिमटती जा रही है. वैसे इसके पीछे कई वजह है , जिसके कारण अब बड़ी संख्या में किसान तम्बाकू की जगह दूसरे वैकल्पिक फसल की खेती के तरफ जा रहे हैं.
समस्तीपुर जिले के ताजपुर, सरायरंजन , मोरवा , वारिसनगर , उजियारपुर जैसे कई प्रखंडो में तंबाकू की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. बेहतर मुनाफा के कारण यह मध्यम व बड़े किसानों का सबसे पंसदीदा फसल बन गया है.वैसे वक्त के साथ जिले में तंबाकू की खेती से अब छोटे किसानों का मोह भंग हो रहा है.
खेती की राह में परेशानी
तंबाकू फसल से जुड़े किसान कुंदन कुमार ने कहा कि अब तंबाकू किसान को इसकी खेती में कोई फायदा नही हो रहा है. तंबाकू के उपज में मजदूरी काफी लगते हैं. इसके अलावे खाद आदि की बढ़ी कीमत के कारण यह खेती काफी महंगी हो गयी है. बदलते मौसम का असर तंबाकू की कम हो रही खेती की भी एक बड़ी वजह है.
समस्तीपुर की नकदी फसल
तंबाकू सिर्फ खपत का मामला नहीं है, बल्कि बिहार में यह किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण नकदी फसल भी है. खासकर समस्तीपुर में तंबाकू की खेती लंबे समय से होती रही है. जिला प्रशासन भी तंबाकू को जिले की प्रमुख फसलों में शामिल करता है. 2026 में प्रकाशित एक कृषि अध्ययन में भी समस्तीपुर में तंबाकू को महत्वपूर्ण व्यावसायिक फसल बताया गया है.
कैंसर का बड़ा खतरा
तंबाकू का अत्यधिक सेवन मानव स्वास्थ्य के लिए विनाशकारी सिद्ध हो रहा है, जिससे गरीब लोग गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं. बिहार के कुल कैंसर रोगियों में तंबाकू सेवन करने वालों की संख्या बहुत बड़ी है. इनमें सबसे भयानक स्थिति मुंह यानी ओरल कैंसर के मरीजों की है, जो चूने के साथ सीधे खैनी दबाने से बढ़ती है.
तंबाकू सेवन के आंकड़े
NFHS-6 (2023-24) के मुताबिक बिहार में 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 45.8% पुरुष किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं. ग्रामीण पुरुषों में यह हिस्सेदारी 47.4%, जबकि शहरी पुरुषों में 36.6% है. महिलाओं में तंबाकू सेवन की दर कुल 4% है. आंकड़ों से स्पष्ट है कि राज्य में पुरुषों का एक बड़ा हिस्सा इसकी चपेट में है.
घटता खेती का क्षेत्र
ताजा उपलब्ध केंद्र सरकार के आंकड़े के अनुसार 2024-25 में बिहार में लगभग 6.74 हजार हेक्टेयर यानी करीब 6,740 हेक्टेयर में तंबाकू की खेती हुई और उत्पादन 11.98 हजार टन यानी कि तकरीबन 11,980 टन का रहा. पूर्व में दस हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि में खैनी की खेती होती रही है. खैनी की खेती क्षेत्रफल के हिसाब से कम हुई है.
उत्पादन में उतार-चढ़ाव
बिहार देश में तंबाकू का पांचवा सबसे बड़ा प्रोड्यूसर है, इससे पहले गुजरात, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक हैं. राज्य में 2020 में 18.030 हज़ार टन तंबाकू का उत्पादन हुआ, जबकि 2019 में यह 18.930 हज़ार टन था. हालांकि प्रोडक्शन में गिरावट आई है, लेकिन पिछले सालों में भी इसी तरह का उतार-चढ़ाव देखा गया है.
तंबाकू से GDP को 1% का नुकसान
तंबाकू जनित बीमारियों के कारण लोगों की कार्यक्षमता घटती है और कामकाजी आबादी में समय से पहले होने वाली मौतों की वजह से राज्य को अपनी मानव पूंजी से हाथ धोना पड़ता है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, तंबाकू से होने वाले संभावित वार्षिक जीडीपी नुकसान में सबसे अधिक राज्य-वार बोझ बिहार (4.34%), उत्तर प्रदेश (3.98%) और मध्य प्रदेश (2.90%) से देखा गया.
2014 से 2022 तक गईं कितनी जानें?
राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम में अनुसार बिहार में वर्ष 2014 में 59,431, वर्ष 2015 में 62,651, वर्ष 2016 में 66,040, वर्ष 2017 में 69,607, वर्ष 2018 में 73,361, वर्ष 2019 में 73,781, वर्ष 2020 में 74,142, वर्ष 2021 में 74,894, वर्ष 2022 में 75,489 और वर्ष 2023 में लगभग 76 हजार लोगों की कैंसर के कारण मौत हुई है.
पिछले वर्षों के रिकॉर्ड
2014 में प्रोडक्शन 23.010 हज़ार टन के ऑल-टाइम हाई पर था, जो 2017 में गिरकर 15.810 हज़ार टन पर आ गया. इसके बाद के सालों में यह 18-19 हज़ार टन के आसपास रहा है. उत्पादन में आई यह कमी दर्शाती है कि खेती के रकबे के साथ-साथ इसका कुल उत्पादन भी अब पहले के मुकाबले धीरे-धीरे सिमट रहा है.
खेती की कुल आय
बिहार में मुख्यतया बीड़ी, हुक्का, चबाने वाले तंबाकू की खेती से 52,000 रु. प्रति हेक्टेयर आमदनी होती है. बिहार में पैदा होने वाले तंबाकू से ज़्यादातर खैनी बनाई जाती है. 2014 में, जब जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री थे, तो खैनी और बीड़ी को छोड़कर तंबाकू प्रोडक्ट्स पर टैक्स 30% से बढ़ाकर 60% कर दिया गया था.
गुटखा पर कानूनी रोक
बिहार में तंबाकू और निकोटिन युक्त गुटखा-पान मसाला पर एक बार फिर एक साल का प्रतिबंध लागू है. 30 मार्च 2026 से लागू मौजूदा आदेश के तहत इनके निर्माण, भंडारण, वितरण, परिवहन और बिक्री पर रोक है. इसके बावजूद 2025 में बिहार के कई इलाकों से गुटखा-पान मसाला की खुलेआम बिक्री की शिकायत सामने आती रही है.

