रायपुर: डायबिटीज को लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चा चल रही है, यह माना जा रहा है कि खान-पान और रहन-सहन डायबिटीज के बढ़ने का बहुत बड़ा कारण है. भोजन पद्धति भी डायबिटीज के बढ़ने का बड़ा कारण है. छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, यहां किसान धान ज्यादा पैदा करते हैं. चावल यहां ज्यादा खाया भी जाता है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या चावल खाने से डायबिटीज बढ़ता है या रहन-सहन, भौगोलिक दशाएं और मिट्टी, डायबिटीज के बढ़ने का कारण हो सकती हैं. वरिष्ठ चिकित्सक डॉक्टर कुलदीप सोलंकी कहते हैं, ”छत्तीसगढ़ में जिस तरह का वातावरण है, वह पूरे विश्व में सबसे बेहतर मिट्टी के तौर पर जाना जाता है. चावल खाने से डायबिटीज नहीं होता यह तय है.
सवाल: छत्तीसगढ़ के किसान सबसे ज्यादा चावल पैदा करते हैं और खाते हैं. क्या चावल शुगर के लेवल को बढ़ाता है ?
जवाब: चावल सुपाच्य भोजन है, इससे शुगर नहीं बढ़ता है. मैं यह पूरे दावे के साथ कह रहा हूं, चावल खाने से शुगर नहीं बढ़ता. गेहूं पैदा करने वाली एक लॉबी के द्वारा यह बात फैलाई जा रही है. पैकेट बंद जितने भी फूड्स आते हैं, वह चावल से नहीं बनते हैं. वह सभी गेहूं से बनते है, इसलिए इस तरह का एक मिथक फैलाया गया है कि चावल खाने से शुगर बढ़ता है. इसका कोई साइंटिफिक बेसिस नहीं है. चावल और गेहूं को कंपेयर करेंगे तो गेहूं डायबिटीज वाले मरीजों के लिए ज्यादा हानिकारक है. क्योंकि चावल हमारा लोकल प्रोडक्ट है, यहां की जलवायु के लिए सर्वोत्तम खाद्य पदार्थ है. चावल को डायबिटीज से जोड़ना बेमानी है. मैं तो कहता हूं कि अच्छा चावल खाएं और नियमित चावल खाएं. चावल के साथ क्या होता है कि वह टेस्टी लगता है तो आदमी थोड़ा लिमिट से ज्यादा खा लेता है. ऐसे में आप ये सोच सकते हैं, फिर शुगर के बढ़ने का असली कारण क्या हो सकता है. दरअसल छत्तीसगढ़ में हमारा जो लोकल खानपान है, वह पिछले 100-150 सालों में बिगड़ गया है. बिगड़ ऐसे गया है कि एक संतुलित आहार में तीन कंपोनेंट होते हैं. कार्बोहाइड्रेट, फैट और प्रोटीन. प्रोटीन के लिए कहा जाता है कि प्रतिदिन बॉडी वेट के अनुसार 50 ग्राम प्रोटीन जरूरी है. 50 ग्राम प्रोटीन खाने के लिए आपको तीन कटोरी दाल हर दिन खाना पड़ेगा. दूध और दूध से बनी हुई विभिन्न वस्तुओं का सेवन बहुत कम होता जा रहा है. इसलिए लोगों का जो प्रोटीन इनटेक है, वह कम हो गया है. यह एक प्रमुख कारण हो सकता है अर्ली डायबिटीज होने का. डायबिटीज के साथ अलग-अलग जो मेटाबॉलिक सिंड्रोम की बीमारियां हैं, जैसे ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, ये सब चीजें एक-एक कर बढ़ने लगती है.
सवाल: छत्तीसगढ़ की व्यवस्था जंगल आधारित थी. मेहनत थी लेकिन अब हम बदल रहे हैं, कहीं यह बड़े कारण तो नहीं बन रहे छत्तीसगढ़ में डायबिटीज के बढ़ने के ?
जवाब: मैं इसे अलग तरीके से देखता हूं. हमारी लाइफ एक्सपेक्टेंसी बढ़ी है. छत्तीसगढ़ के एक औसत व्यक्ति की जो पहले लाइफ एक्सपेक्टेंसी 50 साल थी, वह आज 60 क्रॉस कर चुकी है. हमारी हेल्थ फैसेलिटीज भी अच्छी हुई है. हमारा रहन-सहन अच्छा हुआ है. पानी की गंदगी से होने वाली बीमारियां और इंफेक्शंसपहले खतरनाक साबित होते थे. गांव के गांव खाली हो जाते थे. अब ऐसा नहीं होता है. गैस्ट्रोएन्टराइटिस में सैकड़ों की संख्या में लोगों की जान चली जाती थी. अब हमारा रहन-सहन और खानपान बेहतर हुआ है. लेकिन जिस गति से होना चाहिए था, उस गति से नहीं हुआ. उसका यह कारण नहीं कि हमारे यहां के लोग गरीब हैं. छत्तीसगढ़ इज ए गोल्ड माइन. यहां तो चार फीट आप जमीन खोद देंगे तो आपको कीमती चीजें मिलने लगेंगी. छत्तीसगढ़ का पर कैपिटा इनकम भी बहुत अच्छा है और यहां के लोग संतोषी जीव हैं, उन्हें पैसे की कमी नहीं है. हम महंगा तो खा रहे हैं लेकिन अच्छा नहीं खा रहे.
हम अगर छोटे बच्चों की बात करें, तो हर व्यक्ति चाहता है कि उसको जो जीवन में नहीं मिला है, उसके बच्चों को वो मिले. इस चक्कर में माता-पिता जंक फूड बच्चों को दे रहे हैं. ये जंक फूड बच्चों की सेहत बिगाड़ रहे हैं. जंक फूड में सिर्फ और सिर्फ कार्बोहाइड्रेट और फैट होता है.जंक फूड के बजाय अगर हम पारंपरिक खाद्य पदार्थों में जाएं तो बच्चों के लिए बेहतर होगा. न्यूट्रीशन में अभी तक विश्व की सबसे बड़ी डिस्कवरी यह है कि वेजिटेरियन डाइट में चावल और दाल का कंबीनेशन भारत से आया है. चाहे वह नॉर्थ इंडिया हो या साउथ इंडिया. यहां पर दाल चावल बीमार आदमी को देते हैं. मूंग दाल की खिचड़ी सबके लिए बेस्ट होती है. साउथ इंडिया चले जाएंगे तो डोसा सांभर, इडली सांभर, सांभर वड़ा लोग खाते हैं. इसमें चावल और दाल का ही मिश्रण होता है. चावल में एसेंशियल अमीनो एसिड की कमी होती है. दाल में मिथोनीन की कमी होती है. लेकिन जब दोनों एक साथ मिल जाते हैं तो दोनों की कमी दूर हो जाती है और दोनों एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं. चावल और दाल का कंबीनेशन सही मात्रा में अगर कोई व्यक्ति ले रहा है, तो उसके लिए नॉनवेज डाइट की जरूरत नहीं है.
खाने के क्षेत्र में हमारे जो दुश्मन हैं, उन दुश्मनों को हमें पहचानना होगा. पैक्ड फूड, प्रिजर्व्ड फूड और केमिकल कलर्स के इस्तेमाल से बने फूड्स हमारे लिए खतरनाक हैं. हम इंडियंस जो नॉनवेज खा रहे हैं, वो हमारे लिए फायदेमंद कम और नुकसानदायक ज्यादा हैं. भारत में जिस तरह से नॉनवेज कुक किया जाता है, वो डेड फूड होता है. यही नॉनवेज जो विदेशों में अमेरिका में खाया जाता है, वो ब्वॉयल्ड कर खाते हैं. उसकी पौष्टिकता बनी रहती है. बेशक उबालकर खाना स्वाद के नजरिए से बेहतर नहीं होगा, लेकिन फायदेमंद होगा ये साबित हो चुका है. देर तक पकाने से उसके प्रोटीन और अमीनो एसिड जैसे बेसिक स्ट्रक्चर हमें फायदा नहीं नुकसान पहुंचाते हैं, वो डेड फूड साबित होते हैं.
सवाल: छत्तीसगढ़ में जो भौगोलिक संरचना है, उसमें बहुत सारी चीजों की पैदावार नहीं होती है, हम दूसरे भोजन ले लेते हैं. आर्थिक संरचना जिनकी मजबूत नहीं है, वह चावल और दूसरी चीजों पर निर्भर रहता है. ऐसे में सवाल ये है कि क्या चावल खाने से शुगर बढ़ता है ?
जवाब: छत्तीसगढ़ का एक बड़ा भाग मैदानी एरिया है. यहां दाल और चने की खेती होती है. लोगों को जानकारी की कमी है. चना भी एक प्रकार से दाल है. यहां किसान मूंग की पैदावार भी करते हैं और उससे ज्यादा सोयाबीन की खेती करते हैं. एक सिंपल उपाये हमें ये करना चाहिए कि हम आटे में चना या सोयाबीन को मिलाकर रोटी खाएं. इससे जो प्रोटीन की मात्रा हमें चाहिए वो मिल जाएगी. 1 किलो चावल या गेहूं के आटे में हमें 200 ग्राम के आस पास सोयाबीन या चना मिला देना चाहिए. इससे हमारी जो प्रोटीन की जरूरत है, वो पूरी हो जाएगी. खासकर बच्चों में जो प्रोटीन की कमी होती है, वो दूर हो जाएगी. आजकल हमारे यहां बच्चे दूध नहीं पीते. ऐसे में उनको दूध से बने प्रोडक्ट दें, जैसे दही और पनीर. ये सारी चीजें जब बच्चों और यंगस्टर्स को मिलेंगी, तो वो मजबूत बनेंगे. मजबूत बनेंगे तो बीमारी उनके पास नहीं आएगी. आप अमीर हों, चाहे गरीब प्रोटीन की मात्रा बराबर लें. मूंगफली जरूर खाएं, ये काफी फायदेमंद होता है. मूंगफली और दाल के सेवन से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. मैं ये मानता हूं कि डायबिटीज एक लाइफस्टाइल डिजीज भी है. हमारी जो लाइफ स्टाइल है, उसमें वर्कआउट कम करते हैं, तनाव ज्यादा लेते हैं. छत्तीसगढ़ में एक बहुत बड़ी महामारी आ रही है, वह डायबिटीज से भी खतरनाक है, जिसका नाम है, लीवर डिजीज. लीवर डिजीज का कारण है शराब. शराब खपत में छत्तीसगढ़ काफी आगे है.
सवाल: शराब या नशा सभी डायबिटीज के कारणों में शामिल है क्या ?
जवाब: हां डायबिटीज का एक बड़ा कारण शराब और नशा है. ये हमारे पैंक्रियाज को प्रभावित करता है. पैंक्रियाज हमारे शरीर में बढ़ाने वाले डायबिटीज को 95%कंट्रोल करने का काम करता है, लेकिन अब ये समस्या दूसरी जगह शिफ्ट हो गई है. डोडनियम से 80% डायबिटीज अब कंट्रोल हो रहा है. लेकिन जब कोई व्यक्ति नशा करता है, शराब पीता है या फिर तंबाकू खाता है, तब डोडनियम का इनर लेयर उसको नुकसान पहुंचाने लगता है. जिसके कारण शुगर का इनफ्लक्स और कोलेस्ट्रॉल का इनफ्लक्स ब्लड में बढ़ जाता है. इसको एक स्टेज तक लीवर हैंडल करता है. पर जब लीवर कमजोर हो जाता है, तभी सीधे डायबिटीज और अन्य प्रकार की बीमारी, जिसमें कैंसर भी शामिल है, उसके लिए जिम्मेदार होता है. इसके साथ ही घर में उपयोग होने वाले बर्तन साफ करने के डिटर्जेंट से भी हमारे शरीर को नुकसान पहुंचता है. इसको ब्रिज डोडनियम बैरियर सिंड्रोम भी कहा जाता है. इसलिए हमें किसी भी फॉर्म में नशे का सेवन नहीं करना चाहिए, ये हमारे शरीर की आयु को काम करता है. अल्कोहल जो हमारे शरीर के अंदर जाता है, वह हमारे लाइफ का समय हमसे छीन लेता है.
सवाल: आजकल डायबिटीज छोटे बच्चों में डिटेक्ट हो रहा है, इसके क्या कारण हैं ?
जवाब: छोटे बच्चों में डायबिटीज के कारणों में एक तो जेनेटिक होता है. लेकिन दूसरा जो इसका इंर्पोटेंट पार्ट है, वह फूड इंडस्ट्रीज है, जो एक बड़ा रोल प्ले कर रही है. पैक्ड और प्रिजर्व्ड फूड डायबिटीज को बढ़ाने का काम करती है. इसलिए मैं इस तरह के फूड को डेड फूड कहता हूं. टूथ पेस्ट में भी जो प्रिजर्वेटिव्स होते हैं, वो जब ब्रश करते वक्त हमारे पेट में गलती से चले जाते हैं, तो वो हमारे लिवर और पैंक्रियाज को काफी नुकसान पहुंचाते हैं. कुल मिलाकर फिजिकल एक्टिविटी ना करना भी एक बड़ा कारण है.

