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    Home » वट सावित्री व्रत: अखंड सौभाग्य, अटूट विश्वास और समर्पण का महापर्व
    धार्मिक

    वट सावित्री व्रत: अखंड सौभाग्य, अटूट विश्वास और समर्पण का महापर्व

    DabangBy DabangMay 15, 2026No Comments3 Mins Read
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    भारतीय संस्कृति में ‘वट सावित्री व्रत’ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच अटूट प्रेम, समर्पण और स्त्री की संकल्प शक्ति का प्रतीक है। हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह व्रत इस बार 16 मई 2026 को रखा जाएगा। इस वर्ष यह पर्व और भी खास है क्योंकि इसी दिन शनि जयंती और शनिश्चरी अमावस्या का दुर्लभ संयोग भी बन रहा है।

    1. व्रत का पौराणिक आधार: सावित्री और सत्यवान की कथा

    इस व्रत की मूल जड़ें माता सावित्री के उस अदम्य साहस में हैं, जिन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता और पतिव्रत धर्म से साक्षात मृत्यु के देवता ‘यमराज’ को भी झुकने पर मजबूर कर दिया था। सावित्री ने न केवल अपने पति सत्यवान के प्राण वापस पाए, बल्कि अपने ससुर का खोया हुआ राज्य और आंखों की रोशनी भी वापस माँगी। यह कथा हमें सिखाती है कि यदि संकल्प दृढ़ हो, तो नियति को भी बदला जा सकता है।

    2. ‘वट’ वृक्ष का ही चयन क्यों?

    हिंदू धर्म में वट (बरगद) के वृक्ष को पूजनीय माना गया है। इसके पीछे कई आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण हैं:

    • त्रिदेव का वास: मान्यता है कि वट वृक्ष की जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव का वास होता है।
    • दीर्घायु का प्रतीक: जिस तरह बरगद का वृक्ष सदियों तक जीवित रहता है और उसकी शाखाएं जड़ें बनकर उसे मजबूती देती हैं, ठीक उसी तरह स्त्रियां अपने परिवार और पति के लिए दीर्घायु और स्थिरता की कामना करती हैं।
    • सावित्री का आश्रय: पौराणिक कथा के अनुसार, जब सत्यवान के प्राण हरने यमराज आए थे, तब सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे ही अपने पति के शरीर को सुरक्षित रखा था।

    3. पूजन विधि: श्रद्धा और परंपरा का संगम

    वट सावित्री व्रत के दिन सुहागिन महिलाएं सुबह स्नान कर नए वस्त्र और श्रृंगार धारण करती हैं। इसके बाद:

    • वट वृक्ष के नीचे सावित्री और सत्यवान की प्रतिमा स्थापित की जाती है।
    • वृक्ष की जड़ में जल अर्पित कर अक्षत, पुष्प और धूप-दीप से पूजन होता है।
    • कच्चा सूत लपेटना: महिलाएं वृक्ष के चारों ओर 7, 11, 21 या 108 बार परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत लपेटती हैं। यह सूत संबंधों की पवित्रता और बंधन का प्रतीक है।
    • भीगे हुए चने और फल प्रसाद के रूप में चढ़ाए जाते हैं।

    4. शनि जयंती का विशेष संयोग (16 मई 2026)

    इस साल वट सावित्री व्रत शनिवार के दिन पड़ने से शनिश्चरी अमावस्या का योग बन रहा है। ज्योतिषीय दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण है:

    • सावित्री ने यमराज (जो शनि देव के भाई हैं) को प्रसन्न किया था।
    • इस दिन वट वृक्ष की पूजा करने से न केवल अखंड सौभाग्य मिलता है, बल्कि शनि दोषों से भी मुक्ति मिलती है और पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    5. सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश

    यह व्रत हमें बताता है कि परिवार की धुरी ‘स्त्री’ है। उसका त्याग और संयम पूरे कुल को संरक्षण देता है। आज के आधुनिक युग में भी यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने और जीवन में धैर्य व संयम बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

    शुभ मुहूर्त (16 मई 2026):

    • पूजा का श्रेष्ठ समय: सुबह 07:12 से 08:24 तक।
    • राहुकाल (सावधानी): सुबह 09:00 से 10:30 तक पूजा से बचें।

    निष्कर्ष:
    वट सावित्री व्रत केवल लंबी उम्र की प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह उत्सव है उस प्रेम का जो मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर लेता है। यह पर्व हर घर में खुशहाली और संबंधों में बरगद जैसी मजबूती लेकर आए, यही इसकी सच्ची सार्थकता है।

    पं. गिरीश पाण्डेय
    एस्ट्रो-गुरू, भागवत-व्यास
    एस्ट्रो- सेज पैनल -मेंबर
    सचिव पुरोहित मंच
    ज़िला- महासमुन्द छ.ग.
    संपर्क सूत्र – 7000217167
    संकट मोचन मंदिर
    मण्डी परिसर,पिथौरा

    कुंडली संबंधी कार्यों के लिए संपर्क करें
    (शुल्क -५०१/-)

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