सनातन धर्म में आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी (Yogini Ekadashi) के नाम से जाना जाता है। यह एकादशी जीवन में सुख, समृद्धि और आरोग्यता प्रदान करने वाली मानी गई है। वर्ष 2026 में इस योगिनी एकादशी के साथ पंचांग का अत्यंत दुर्लभ ‘त्रिस्पर्शा’ (Trisparsha) योग बन रहा है, जिससे यह व्रत एक साधारण उपवास न रहकर ‘महाव्रत’ का रूप ले चुका है।
आइए जानते हैं इस विशेष शास्त्रीय संयोग का महत्व, पौराणिक कथा, वर्ष 2026 की सटीक तिथियां और पारण के नियम।
वर्ष 2026 व्रत एवं पारण की महत्वपूर्ण तिथियां
योगिनी एकादशी (त्रिस्पर्शा महाद्वादशी व्रत): 11 जुलाई 2026, दिन – शनिवार
व्रत का पारण (Vrat Parana): 12 जुलाई 2026, दिन – रविवार
- योगिनी एकादशी का शास्त्रीय महत्व
‘योगिनी’ शब्द योग और आंतरिक शुद्धि का प्रतीक है। पद्म पुराण के अनुसार, इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के सभी ज्ञात-अज्ञात पाप नष्ट हो जाते हैं।
शारीरिक कष्टों से मुक्ति: यह एकादशी विशेष रूप से किसी भी प्रकार के श्राप, त्वचा संबंधी रोग (जैसे कुष्ठ रोग) और संक्रामक बीमारियों से मुक्ति के लिए अमोघ मानी गई है।
पुण्य फल: भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर से कहा था कि योगिनी एकादशी का व्रत रखने से 88,000 ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर फल प्राप्त होता है।
पौराणिक कथा (हेममाली यक्ष की कथा)
स्वर्गधाम में अलकापुरी नगरी के राजा कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे। ‘हेममाली’ नामक एक यक्ष राजा कुबेर के लिए मानसरोवर से पूजा के फूल लाया करता था। हेममाली अपनी अत्यंत सुंदर पत्नी ‘विशालाक्षी’ के प्रेम में अत्यधिक आसक्त था। एक दिन वह पत्नी के प्रेम-पाश में बंधकर समय पर राजा कुबेर के पास फूल पहुंचाना भूल गया।
क्रोधित होकर राजा कुबेर ने हेममाली को श्राप दे दिया कि वह स्त्री वियोग सहेगा और मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जाकर कुष्ठ रोगी बन जाएगा। श्राप के प्रभाव से हेममाली पृथ्वी पर आ गिरा और भयानक कष्ट भोगने लगा। भटकते-भटकते वह हिमालय पर मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पहुंचा। ऋषि ने अंतर्दृष्टि से उसका दुख जानकर उसे आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का व्रत पूर्ण निष्ठा से करने को कहा। हेममाली ने विधि-विधान से व्रत किया, जिसके प्रभाव से उसका कुष्ठ रोग समूल नष्ट हो गया और वह पुनः दिव्य रूप धारण कर अपनी पत्नी के साथ सुखी जीवन व्यतीत करने लगा।
- त्रिस्पर्शा महाद्वादशी (Trisparsha Dvadashi) क्या है?
ज्योतिष और हरिभक्ति विलास आदि ग्रंथों में ‘त्रिस्पर्शा’ को एक सर्वोत्तम तिथि संयोग माना गया है।
शास्त्रीय नियम: जब एक ही सूर्योदय के दिन (यानी एक ही २४ घंटे के चक्र में) तीन तिथियां आपस में स्पर्श करती हैं—एकादशी, द्वादशी और त्रयोदशी—तो उसे ‘त्रिस्पर्शा महाद्वादशी’ कहते हैं।
इस एक व्रत को करने से एक हजार एकादशी व्रतों का संयुक्त फल अकेले ही प्राप्त हो जाता है। यही कारण है कि वर्ष 2026 की इस एकादशी को साधारण न मानकर महाद्वादशी व्रत के रूप में मनाया जा रहा है।
- व्रत, साधना और पारणा के विशेष नियम
इस महायोग में व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए:
तुलसी अर्चन और निषेध: भगवान विष्णु को बिना तुलसी दल के भोग न लगाएं। ध्यान रहे, एकादशी तिथि (11 जुलाई) के दिन तुलसी पत्र तोड़ना वर्जित है, इसलिए एक दिन पहले ही तुलसी पत्र तोड़कर रख लें।
पीत रंग का प्रयोग: पूजा में भगवान को पीले वस्त्र, पीले फूल, पीला चंदन और ऋतु फल अर्पित करें।
रविवार को पारण: शनिवार, 11 जुलाई को पूर्ण उपवास रखने के बाद 12 जुलाई, रविवार को स्थानीय पंचांग में दिए गए शुद्ध पारण मुहूर्त के भीतर ही व्रत खोलें। पारण के समय किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान-दक्षिणा देना अत्यंत शुभ फलदायी होता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
11 जुलाई 2026 को आने वाला योगिनी एकादशी और त्रिस्पर्शा द्वादशी का यह संगम केवल एक उपवास नहीं, बल्कि तन, मन और आत्मा के कायाकल्प का महापर्व है। शारीरिक व्याधियों से जूझ रहे जातकों और आध्यात्मिक उन्नति के इच्छुक साधकों को इस दुर्लभ अवसर का लाभ उठाकर व्रत, दान और नारायण संकीर्तन अवश्य करना चाहिए।
आचार्य पं गिरीश पाण्डेय
एस्ट्रोसेज पैनल मेंबर
मंदिर चौक पिथौरा
महासमुंद (छ.ग.)
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