अगर किसी छोटे बच्चे की आंख की काली पुतली की जगह सफेद चमक दिखाई दे, वह अचानक भेंगा नजर आने लगे या उसकी आंख में लगातार लालपन और सूजन बनी रहे, तो इसे सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है. यह रेटिनोब्लास्टोमा नामक आंख के कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है.
इसे लेकर पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGI) के एडवांस आई सेंटर के विशेषज्ञों ने माता-पिता से अपील की है कि ऐसे किसी भी लक्षण पर तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ से जांच कराएं. समय पर पहचान और इलाज से बच्चे की आंख, उसकी दृष्टि और जान तीनों बचाई जा सकती हैं.
हर साल 70 से 80 मरीज पहुंचते हैं PGI: पीजीआई में हर साल करीब 70 से 80 बच्चे रेटिनोब्लास्टोमा की शिकायत लेकर पहुंचते हैं. इनमें कई मरीज शुरुआती अवस्था में इलाज शुरू होने के कारण स्वस्थ हो जाते हैं, जबकि कुछ बच्चे देर से अस्पताल पहुंचने के कारण गंभीर स्थिति में होते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि बीमारी जितनी जल्दी पकड़ी जाएगी, इलाज उतना ही प्रभावी होगा और आंख को बचाने की संभावना भी अधिक रहेगी.
शुरुआती पहचान इलाज की सफलता”: इस बारे में अधिक जानकारी के लिए ईटीवी भारत ने चंडीगढ़ पीजीआई के एडवांस आई सेंटर की प्रमुख डॉ. ऊषा सिंह ने कहा कि, “रेटिनोब्लास्टोमा मुख्य रूप से पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में होने वाला आंख का कैंसर है. यदि शुरुआती लक्षणों को समय रहते पहचान लिया जाए और इलाज तुरंत शुरू हो जाए, तो कई मामलों में बच्चे की आंख और उसकी दृष्टि दोनों को सुरक्षित रखा जा सकता है.”
क्या है रेटिनोब्लास्टोमा?: डॉ. ऊषा सिंह ने आगे कहा कि, “रेटिनोब्लास्टोमा आंख के रेटिना में विकसित होने वाला कैंसर है. रेटिना आंख का वह हिस्सा है जो प्रकाश को पहचानकर मस्तिष्क तक संदेश पहुंचाता है. यह बीमारी अधिकतर RB1 जीन में म्यूटेशन के कारण होती है. कुछ मामलों में यह आनुवंशिक भी हो सकती है, इसलिए जिन परिवारों में पहले यह बीमारी रही हो, वहां विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत होती है.”
इन लक्षणों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज: डॉ. ऊषा सिंह के अनुसार यदि मोबाइल फ्लैश या फोटो में बच्चे की आंख की पुतली सफेद दिखाई दे, अचानक भेंगापन आ जाए, आंखों की रोशनी कम होने लगे, लगातार लालपन या सूजन बनी रहे अथवा आंख का आकार असामान्य लगे, तो तुरंत जांच करानी चाहिए. ये सभी रेटिनोब्लास्टोमा के शुरुआती संकेत हो सकते हैं.
“इलाज में देरी जान के लिए भी खतरा बन सकती है”: डॉ. ऊषा सिंह ने कहा कि, “यदि समय पर इलाज नहीं कराया गया तो यह कैंसर आंख के बाहर भी फैल सकता है. इससे न केवल बच्चे की दृष्टि प्रभावित होती है, बल्कि उसकी जान को भी खतरा हो सकता है. इसलिए शुरुआती लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए. अब आधुनिक तकनीकों और उपचार पद्धतियों के कारण रेटिनोब्लास्टोमा का सफल इलाज संभव है. हालांकि आंखों की रोशनी को पूरी तरह सामान्य होने में समय लग सकता है, लेकिन यदि बीमारी शुरुआती अवस्था में पकड़ में आ जाए तो कई मामलों में आंख निकालने की जरूरत भी नहीं पड़ती और दृष्टि को भी काफी हद तक बचाया जा सकता है.”
1996 से बच्चों की आंखों की रोशनी बचाने में जुटा PGI: डॉ. ऊषा सिंह ने बताया कि, “पीजीआई में वर्ष 1996 से रेटिनोब्लास्टोमा क्लीनिक संचालित किया जा रहा है. यहां पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, बिहार, राजस्थान और उत्तराखंड समेत कई राज्यों से बच्चे इलाज के लिए आते हैं. हर साल करीब 75 से 80 नए मरीज यहां पहुंचते हैं. समय पर इलाज शुरू होने से अधिकांश बच्चों में बेहतर परिणाम देखने को मिलते हैं.
डॉक्टरों ने बचाई बेटे की आंख”: संगरूर निवासी रणजीत सिंह अपने बेटे हरनूर का इलाज पीजीआई में करवा रहे हैं. उन्होंने बताया कि, “जब हरनूर करीब चार साल का था, तब उसकी आंखों की रोशनी कम होने लगी और बाद में भेंगापन भी दिखाई देने लगा. जांच में रेटिनोब्लास्टोमा की पुष्टि हुई तो पूरा परिवार घबरा गया, लेकिन डॉक्टरों ने भरोसा दिलाया कि समय पर इलाज से बच्चा ठीक हो सकता है. इलाज के बाद हरनूर की आंखों की रोशनी में काफी सुधार हुआ है. अब उसे पढ़ाई में पहले जैसी परेशानी नहीं होती. विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख और समय पर इलाज से हमारे बेटे की आंख बचाई जा सकी. यदि शुरुआत में लक्षणों को नजरअंदाज किया जाता, तो स्थिति कहीं अधिक गंभीर हो सकती थी.
दो साल की उम्र में कैंसर, आज कर रहे सरकारी नौकरी: वहीं, बिहार के निवासी धनीराम की कहानी समय पर इलाज की अहमियत को साबित करती है. दरअसल, जब वे दो साल के थे, तब उनकी आंखों में लगातार लालपन रहने लगा. साल 2003 में उनका परिवार उन्हें पीजीआई लेकर आया, जहां जांच में रेटिनोब्लास्टोमा का पता चला. डॉक्टरों ने तुरंत इलाज और कीमोथेरेपी शुरू की. शुरुआत में उन्हें हर तीन महीने में जांच के लिए आना पड़ता था, लेकिन धीरे-धीरे उनकी स्थिति बेहतर होती गई. अब 23 वर्षीय धनीराम सरकारी नौकरी कर रहे हैं और बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा भी देते हैं. धनीराम कहते हैं कि, “बचपन में पढ़ाई करने में काफी परेशानी होती थी, लेकिन समय पर इलाज मिलने से मेरी आंख बच गई. आज मुझे करीब 25 से 30 प्रतिशत तक दिखाई देता है. मैं बच्चों को आंखों की देखभाल और स्क्रीन टाइम कम रखने के लिए भी जागरूक करता हूं.”
माता-पिता की सतर्कता ही सबसे बड़ी सुरक्षा: PGI के विशेषज्ञों का कहना है कि रेटिनोब्लास्टोमा दुर्लभ जरूर है, लेकिन इसकी शुरुआती पहचान बेहद आसान हो सकती है. यदि माता-पिता बच्चों की आंखों में होने वाले असामान्य बदलावों पर ध्यान दें और समय रहते विशेषज्ञ से परामर्श लें, तो अधिकतर मामलों में न केवल आंख और दृष्टि बचाई जा सकती है, बल्कि बच्चे का जीवन भी सुरक्षित रखा जा सकता है. यही कारण है कि डॉक्टर किसी भी असामान्य लक्षण को नजरअंदाज न करने की सलाह दे रहे हैं.

