हम सभी जानते हैं कि पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम आज बड़ी संख्या में महिलाओं को प्रभावित करने वाली एक समस्या है. यह अक्सर मासिक धर्म, ओव्यूलेशन और फर्टिलिटी पर असर डालती है. हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल प्रजनन या हार्मोन से जुड़ी समस्या नहीं है. यह मेटाबोलिक और भावनात्मक (मानसिक) स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ी हुई स्थिति है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी PCOS को एक मेटाबोलिक स्थिति मानता है, जो प्रजनन की उम्र के बाद भी बनी रह सकती है. WHO का कहना है कि इसमें मेटाबोलिक और हार्मोनल असंतुलन शामिल होता है, इसलिए यह प्रजनन के दौर (खासकर मेनोपॉज) के बाद भी महिलाओं के शरीर को प्रभावित करती रहती है.
इसलिए, पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम का नाम हाल ही में मेडिकल दुनिया में पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवरी सिंड्रोम रखा गया है.सैफी हॉस्पिटल में ऑब्सटेट्रिशियन और गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. निधि शर्मा चौहान का कहना है कि PCOS का मेटाबोलिक पहलू बहुत महत्वपूर्ण है. इस स्थिति वाली कई महिलाओं को इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या हो सकती है, जिसका मतलब है कि शरीर इंसुलिन पर उतनी अच्छी तरह प्रतिक्रिया नहीं देता जितना उसे देना चाहिए. इससे पेट के आसपास वजन बढ़ने का खतरा बढ़ सकता है और समय के साथ टाइप 2 डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल, हाई ब्लड प्रेशर और दिल से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. हालांकि यह जरूरी नहीं कि हर महिला को सभी जटिलताएं हों, लेकिन इसके जोखिमों को पहले से समझकर लाइफस्टाइल में बदलाव करना बहुत जरूरी है.
PCOS का मानसिक और भावनात्मक सेहत पर गहरा असर
इरेगुलर पीरियड्स, मुंहासे, चेहरे पर अनचाहे बाल, वजन में उतार-चढ़ाव या गर्भधारण में कठिनाई जैसी समस्याओं के साथ जीने का गहरा भावनात्मक असर हो सकता है. कई महिलाएं अपने शरीर और रूप-रंग को लेकर चिंतित रहती हैं या अपनी फर्टिलिटी को लेकर घबराहट महसूस करती हैं, जिससे उन्हें काफी मानसिक परेशानी होती है. असल में, PCOS आत्मविश्वास शरीर के प्रति नजरिए और जीवन की समग्र गुणवत्ता पर असर डाल सकता है.
डॉ. निधि शर्मा चौहान का कहना है कि फिजिकल बदलाव (जैसे वजन बढ़ना, चेहरे पर बाल उगना, या मुंहासे) से नेचुरली सेल्फ-एस्टीम और सेल्फ-कॉन्फिडेंस में कमी आती है. इसके अलावा, कंसीव करने में मुश्किल महिलाओं के लिए मेंटली थकाने वाली हो सकती है, जिससे एंग्जायटी या डिप्रेशन हो सकता है. इंटरनेशनल गाइडलाइंस PCOS वाली महिलाओं को डिप्रेशन और एंग्जायटी के लिए स्क्रीनिंग करने की सलाह देती हैं, क्योंकि ये कंडीशन अलग-अलग या सेकेंडरी दिक्कतों के बजाय पूरी देखभाल का एक जरूरी हिस्सा हैं.
PCOS को कैसे मैनेज करें
PCOS के मामलों में, पीरियड्स को रेगुलर करने के लिए सिर्फ दवाइयों पर निर्भर रहना हमेशा काफी नहीं होता है. ये गोलियां बीमारी को जड़ से खत्म नहीं करतीं, बल्कि, ये सिर्फ कुछ समय के लिए लक्षणों को दबाती हैं. PCOS का मैनेजमेंट हमेशा होलिस्टिक होना चाहिए. हर व्यक्ति के हिसाब से, इसमें हेल्थ चेक-अप, हेल्दी डाइट, फिजिकल एक्टिविटी, नींद और स्ट्रेस लेवल का ध्यान रखना और इमोशनल वेल-बीइंग पर ध्यान देना शामिल हो सकता है. सबसे जरूरी बात यह है कि लाइफस्टाइल में बदलाव को सजा की तरह नहीं देखा जाना चाहिए और न ही इन्हें सिर्फ वजन कम करने तक सीमित रखना चाहिए. हेल्दी आदतें सेहत और जीवन की क्वालिटी को बेहतर बना सकती हैं, भले ही वजन कम करना मुख्य लक्ष्य न हो.
शायद सबसे बड़ा बदलाव जो जरूरी है, वह यह है कि हम PCOS के बारे में कैसे बात करते हैं. किसी महिला को अपनी स्थिति को गंभीरता से लिए जाने के लिए तब तक इंतजार नहीं करना चाहिए. जब तक वह गर्भधारण की कोशिश न कर रही हो, उसका वजन न बढ़ रहा हो या वह इमोशनल तौर पर संघर्ष न कर रही हो. PCOS सिर्फ पीरियड्स की समस्या नहीं है. यह लंबे समय तक रहने वाली स्वास्थ्य स्थिति है, जिसमें शरीर, मेटाबॉलिज्म और मन पर ध्यान देने की जरूरत होती है.

