ज्यादातर लोग लंग कैंसर को स्मोकिंग से जोड़ते हैं. हालांकि तंबाकू अभी भी इसका मुख्य कारण है, लेकिन एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि रोजाना की अलग-अलग आदतें और एक्सपोजर धीरे-धीरे फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकते हैं और कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं, यहां तक कि उन लोगों में भी जो स्मोकिंग नहीं करते. यह बात भारत के लिए खास तौर पर अहम है, क्योंकि यहां वायु प्रदूषण, घर के अंदर का धुआं और पर्यावरण से जुड़े जोखिम आम हैं. पुणे के M.O.C कैंसर केयर के मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अश्विन राजभोज का कहना है कि इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) के अनुसार, फेफड़ों के कैंसर के लगभग 85 फीसदी मामलों के लिए तंबाकू जिम्मेदार है, लेकिन वायु प्रदूषण, दूसरों के सिगरेट पीने से निकलने वाला धुआं (सेकंडहैंड स्मोक) और घर के अंदर मौजूद प्रदूषक भी इसके जोखिम कारक हैं.
रोजाना की ये आदतें चुपचाप आपके फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकती हैं, जिनमें शामिल है…
सिगरेट या बीड़ी पीना –
फेफड़ों के कैंसर का सबसे बड़ा कारण, जिसे रोका जा सकता है. वहीं, स्मोकलेस तंबाकू (जैसे गुटखा, खैनी और जर्दा) को सुरक्षित मानना एक बड़ी और जानलेवा गलतफहमी है. भले ही इसका धुआं फेफड़ों में नहीं जाता, लेकिन यह सीधे संपर्क में आने से इस्तेमाल करने वाले को कैंसर पैदा करने वाले कार्सिनोजेन्स के संपर्क में लाता है.
सेकेंडहैंड धुएं को नजरअंदाज करना-
किसी और के धुएं के रेगुलर संपर्क में आने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा काफी बढ़ सकता है.
बिना सुरक्षा के भारी ट्रैफिक में घंटों बिताना-
गाड़ी और डीजल से निकलने वाले धुएं में कैंसर पैदा करने वाले प्रदूषक होते हैं.
खराब हवादार रसोई में खाना पकाना-
तलने, बायोमास ईंधन, केरोसिन और ठोस ईंधन से निकलने वाला धुआं परिवारों को हानिकारक कणों के संपर्क में ला सकता है. जिससे कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है.
अगरबत्ती, धूप और मच्छर भगाने वाली कॉइल-इन्हें रोज जलाने से बारीक कण निकलते हैं जो लंबे समय तक फेफड़ों में जलन पैदा कर सकते हैं. मेडिकल एक्सपर्ट्स ने कन्फर्म किया है कि इनसे निकलने वाला माइक्रोस्कोपिक धुआं सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है और इससे फेफड़ों का कैंसर भी हो सकता है.
घर के अंदर हवा के आवागमन (वेंटिलेशन) पर ध्यान न देन– हवा का सही संचार न होने से घर के अंदर प्रदूषक तत्व जमा हो जाते हैं, जिससे बाद में फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है.
लगातार खांसी या सांस फूलने को नजरअंदाज करना-लगातार बने रहने वाले सांस संबंधी लक्षणों को कभी भी सिर्फ प्रदूषण या मौसमी एलर्जी के कारण मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
शारीरिक गतिविधि से बचना–नियमित व्यायाम फेफड़ों की कार्यक्षमता और श्वसन तंत्र की समग्र सेहत को बेहतर बनाता है.
रिस्क फैक्टर्स के बावजूद हेल्थ चेक-अप में देरी करना- जो लोग स्मोकिंग करते हैं, काम से जुड़े खतरों का सामना करते हैं, या लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहते हैं, उन्हें अपने डॉक्टर से लंग हेल्थ स्क्रीनिंग के बारे में बात करनी चाहिए.
बहुत से भारतीयों का मानना है कि फेफड़ों का कैंसर (लंग कैंसर) सिर्फ धूम्रपान करने वालों को ही होता है. हालांकि, अब हम ऐसे लोगों में भी फेफड़ों का कैंसर देख रहे हैं जो प्रदूषित हवा, दूसरों के धूम्रपान के धुएं (सेकंड-हैंड स्मोक) और घर के अंदर मौजूद प्रदूषकों के संपर्क में आते हैं. खतरा इस बात में है कि ये चीजें रोजमर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाती हैं और अक्सर इन पर ध्यान नहीं दिया जाता. पुणे के M.O.C कैंसर केयर के मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अश्विन राजभोज का कहना है कि फेफड़ों की सेहत को सुरक्षित रखने के लिए, न सिर्फ तंबाकू के इस्तेमाल के बारे में जागरूक होना जरूरी है, बल्कि उस माहौल के बारे में भी जागरूक होना जरूरी है जहां हम रहते और काम करते है.
डॉ. अश्विन राजभोज कहते हैं कि अच्छी बात यह है कि इनमें से कई जोखिमों को बदला या कम किया जा सकता है. इनमें तंबाकू से दूर रहना, हवा के सही आवागमन (वेंटिलेशन) का ध्यान रखना, प्रदूषित माहौल में कम से कम रहना और लगातार बने रहने वाले लक्षणों के लिए डॉक्टर से सलाह लेना शामिल है. फेफड़ों की सेहत को सुरक्षित रखने में ये उपाय बहुत असरदार साबित हो सकते हैं. दुनिया भर में धूम्रपान न करने वालों में भी फेफड़ों के कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए, रोजमर्रा के इन जोखिमों के बारे में जागरूकता पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गई है.
