कोरबा :- छत्तीसगढ़ की औद्योगिक पहचान और देश के ऊर्जा मानचित्र पर कोरबा जिला आज सिर्फ राज्य ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत के आर्थिक और औद्योगिक विकास का पावर हाउस बन चुका है. ऊर्जाधानी के रूप में विख्यात कोरबा कोयला और ताप विद्युत संयंत्रों के दम पर देश के कई राज्यों की ऊर्जा जरूरत को पूरा कर रहा है. बुनियादी सुविधा के साथ उद्योगों को रोशनी कोरबा से ही मिल रही है.
कोल और बिजली उत्पादन में अग्रणी
राज्य गठन के बाद से कोरबा में कोयले का उत्खनन और बिजली का उत्पादन दोनों ही तीन से चार गुना तक बढ़ चुके हैं. कोल इंडिया लिमिटेड को लगभग 25 फीसदी कोयला अकेले कोरबा जिले से मिलता है. अनुषंगी कंपनी साउथ ईस्टर्न कोल फील्ड(एसईसीएल) की मेगा परियोजना है. कोरबा में ही संचालित गेवरा अब एशिया की सबसे बड़ी ओपन कास्ट कोल माइंस बनने की ओर अग्रसर है. वहीं 1320 मेगावाट का HTPS संयंत्र भी अब सुपर क्रिटिकल पावर प्लांट बनने जा रहा है. जिसकी नींव कोरबा में रखी जा चुकी है, कार्य प्रगति पर है.
दूसरों राज्यों में बिजली होती है सप्लाई
कोरबा से उत्पादित कोयला और यहां पैदा की गई बिजली देश के पश्चिमी और उत्तरी ग्रिड को लगातार ऊर्जा सप्लाई करती है. महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों के उद्योग और रेल नेटवर्क कोरबा की बिजली पर निर्भर हैं. छत्तीसगढ़ को पावर सरप्लस राज्य का दर्जा दिलाने में कोरबा का योगदान सर्वाधिक है.
बिजली की आंखमिचौली भी होनी चाहिए बंद
शहर के वरिष्ठ नगरिक एवं रेड क्रॉस समिति के अध्यक्ष राम सिंह अग्रवाल कहते हैं कि जब छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश से अलग होकर अलग राज्य बना. तब इसके हिस्से में कई बिजली कारखाने आए, ज्यादातर कोरबा जिले में संचालित है. 2014 के आसपास कई एमओयू पर हस्ताक्षर हुए थे. लेकिन वह सफल नहीं हुए, अन्यथा और भी कई पावर प्लांट यहां स्थापित हो जाते. यहां कोयला और पानी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है.
राजस्व का सबसे बड़ा जरिया
साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) की कोरबा में मौजूद कोयला खदानों गेवरा, दीपका, कुसमुंडा से केंद्र और राज्य सरकार को सालाना हजारों करोड़ रुपये की रॉयल्टी, जीएसटी और डीएमएफ (DMF) फंड मिलता है. जिससे राज्य के विकास कार्यों को गति मिलती है. 1 नवंबर 2000 को जब मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य बना, तब से लेकर आज तक कोरबा ने उत्पादन के हर आंकड़े में अभूतपूर्व बढ़ोतरी दर्ज की है.
70 मिलियन टन को बढ़ रही गेवरा
कोरबा की गेवरा मेगा प्रोजेक्ट एशिया की सबसे बड़ी कोयला खदानों में से एक बन चुकी है.जिसकी स्वीकृत क्षमता 70 मिलियन टन प्रति वर्ष तक पहुंच रही है. जमीनों का अधिग्रहण और विस्तार का काम जारी है. तो वहीं दूसरी तरफ दीपका और कुसमुंडा खदानें भी देश में सर्वाधिक उत्पादन करने वाली शीर्ष खदानों में शामिल हैं.
हालांकि एसईसीएल के क्षेत्र में आने वाले भू-विस्थापितों की सालों से लंबित मांगें पुनर्वास, मुआवजा और रोजगार का मुद्दा भी प्रमुख है. इन समस्याओं का समाधान किए बिना, सतत विकास की परिकल्पना को साकार नहीं माना जा सकता.
DMF के जरिए विकास के लिए मिला बड़ा फंड
चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष योगेश जैन कहते हैं कि छत्तीसगढ़ के साथ ही कोरबा का उत्तरोत्तर विकास हुआ है, वर्ष 2000 में राज्य जब अलग होकर बना. तब से लेकर अब तक कई विकास के कार्य हुए हैं. पिछले साल अकेले कोरबा जिले से 12 करोड़ मिलियन टन कोयले का उत्पादन हुआ है, जो एक बहुत बड़ी मात्रा है. ज्यादातर कोयला हम कोरबा जिले से ही देते हैं.
सुपरक्रिटिकल तकनीक से नया विस्तार
छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी (CSPGCL) कोरबा में 1320 मेगावाट (660 MW x 2) का नया अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट स्थापित कर रही है.जिससे पर्यावरण मानकों का पालन करते हुए अधिक बिजली बनेगी. यह राज्य शासन का सर्वाधिक बिजली उत्पादन करने वाला पावर प्लांट बन जाएगा.
जबकि कोरबा में ही NTPC कोरबा सुपर थर्मल पावर स्टेशन देश के सबसे कुशल और उच्च पीएलएफ पर चलने वाले पावर प्लांटों में निरंतर शीर्ष स्थान पर बना हुआ है. जिसकी बिजली उत्पादन क्षमता 2600 मेगावाट है, यहां से पैदा हुई बिजली सीधे सेंट्रल ग्रिड को जाती है.
वर्ष 2000 में कोरबा की कुल स्थापित ताप विद्युत क्षमता लगभग 2,000 मेगावाट से 2,400 मेगावाट के आसपास थी. वर्तमान में सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों को मिलाकर कोरबा की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 6,000 मेगावाट से अधिक हो चुकी है.
NTPC कोरबा (सुपर थर्मल पावर स्टेशन)
2600 मेगावाट की स्थापित क्षमता के साथ यह देश के सबसे सस्ते और कुशल पावर प्लांट्स में गिना जाता है.DSPM एवं HTPS (कोरबा पूर्व एवं पश्चिम) छत्तीसगढ़ राज्य बिजली उत्पादन कंपनी (CSPGCL) के तहत संचालित इन संयंत्रों ने राज्य को पावर सरप्लस बनाने में मुख्य भूमिका निभाई है.
बालको (BALCO) कैप्टिव पावर प्लांट
एल्युमिनियम उत्पादन के साथ-साथ यह संयंत्र 1,200 MW से अधिक ऊर्जा का स्व-उत्पादन करता है.
नवीन विस्तार: CSPGCL द्वारा 1,320 मेगावाट (660 MW × 2) की नई सुपरक्रिटिकल इकाइयों की स्थापना पर तेजी से कार्य जारी है, जिससे भविष्य में उत्पादन क्षमता और बढ़ेगी.
बिजली और कोयला से जिला काफी आगे बढ़ा
पर्यावरण एक्टिविस्ट लक्ष्मी चौहान कहते हैं कि जब एमपी से छत्तीसगढ़ राज्य बना. तब कोयले का उत्पादन काफी कम था, अब तो लगभग 120 मिलियन टन से भी अधिक कोयला हम यहां उत्पादन कर रहे हैं. पूरे देश को लगभग 25 फीसदी कोयला कोरबा से मिलता है. बिजली के मामले में भी यही हालत है, एल्युमिनियम का उत्पादन भी यहां लगातार हो रहा है. नए स्मेल्टर बने हैं.
फ्लाई ऐश का यूटिलाइजेशन बड़ी समस्या
जहां एक ओर कोरबा ने देश को रोशन किया है, वहीं दूसरी ओर अत्यधिक खनन और तापीय विद्युत उत्पादन के कारण पर्यावरण संतुलन, राख प्रबंधन और वायु गुणवत्ता की चुनौतियां भी उभरी हैं. वर्तमान में आधुनिक सुपरक्रिटिकल टेक्नोलॉजी, पर्यावरण अनुकूल खनन तकनीकों और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण के माध्यम से सतत विकास का मार्ग अपनाया जा रहा है.

