जीवित्पुत्रिका व्रत— हिंदू धर्म में आश्विन माह के कृष्ण पक्ष में रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका व्रत (जितिया या जिउतिया) माताओं के लिए सबसे कठिन और महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना जाता है। संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और मंगलकामना के लिए तीन दिनों तक चलने वाले इस व्रत में माताएं निर्जला उपवास रखकर भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। पूजा के समापन पर व्रती माताएं अपने हाथ या गले में ‘जितिया धागा’ धारण करती हैं, जिसे धार्मिक मान्यताओं में संतान के लिए एक अटूट सुरक्षा कवच माना गया है।
संतान के लिए रक्षा कवच क्यों माना जाता है जितिया धागा
जितिया व्रत के दौरान माताएं भगवान जीमूतवाहन के समक्ष लाल या पीले रंग का धागा अर्पित करती हैं और विधि-विधान से पूजा संपन्न होने के बाद इसे स्वयं धारण करती हैं। मान्यता है कि यह धागा संतान के जीवन से सभी कष्टों को दूर रखता है और उनके भाग्य को सुदृढ़ बनाता है।
स्कंद पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, भगवान जीमूतवाहन ने अपने त्याग और साहस से नागवंश के बालकों की रक्षा की थी। इसी कारण उनकी पूजा के बाद धारण किया जाने वाला यह धागा माता के अटूट प्रेम और ईश्वर के संरक्षण का प्रतीक माना जाता है।
धागा धारण करने के नियम और संतानों की संख्या का गणित
जितिया धागे को धारण करने को लेकर शास्त्रों और लोक परंपराओं में विशेष नियम बताए गए हैं:
धारण करने का स्थान: व्रती माताएं इस धागे को अपनी दाहिनी कलाई या गले में लॉकेट के साथ धारण करती हैं।
गांठ बांधने की परंपरा: इस धागे में अपनी संतानों की कुल संख्या से एक अधिक गांठ लगाई जाती है। यदि किसी माता की दो संतानें हैं, तो धागे में तीन गांठें लगाई जाएंगी।
शुभ रंग: यह धागा केवल लाल या पीले रंग का होता है, जो घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
कितने समय तक बांधना चाहिए जितिया धागा
धार्मिक नियमों के अनुसार, पूजा समाप्त होने के बाद जितिया धागे को कम से कम 24 घंटे यानी एक पूरे दिन तक बांधना अनिवार्य है। हालांकि, कई माताएं अपनी श्रद्धा और संकल्प के अनुसार इसे पूरे एक वर्ष तक यानी अगले जितिया व्रत तक पहनकर रखती हैं।
धागा उतारते समय भूलकर भी न करें ये गलतियां
यदि आप जितिया धागे को उतारना चाहती हैं, तो शास्त्रों के अनुसार इसके लिए विशेष नियमों का पालन करना जरूरी है:
वर्जित दिन: इस धागे को कभी भी रविवार या मंगलवार के दिन शरीर से अलग नहीं करना चाहिए।
विसर्जन का सही तरीका: उतारे गए धागे को कभी भी घर के कचरे में न फेंकें। इसे पूरी श्रद्धा के साथ किसी पवित्र नदी या बहते जल में प्रवाहित करें, या फिर किसी पीपल या वट वृक्ष की जड़ के पास रख दें।जीवित्पुत्रिका व्रत की पूर्णता तभी मानी जाती है जब माताएं नियमानुसार इस पवित्र धागे को धारण कर अपनी संतानों के रक्षा का संकल्प लेती हैं।

