पुरुषों और महिलाओं, दोनों में फर्टिलिटी के लिए 20 से 30 साल की उम्र को सबसे अच्छा माना जाता है. इस दौरान बीमारी का असर बहुत कम होता है और शरीर आम तौर पर बहुत स्वस्थ रहता है. हालाँकि, समय तेजी से बदल रहा है. आज के समय में बहुत से कपल 20 या 30 की उम्र में ही इनफर्टिलिटी की समस्याओं का सामना कर रहे हैं. युवाओं में फर्टिलिटी का स्तर दिन-ब-दिन कम हो रहा है. जहां पहले ऐसी समस्याएं 35 या 40 साल की उम्र के बाद सामने आती थीं, वहीं अब ये कम उम्र के लोगों में भी आम हो गई हैं.
भारत दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला देश माना जाता है, जिसकी आबादी लगभग 1.46 अरब है. हालांकि, रिपोर्टों से पता चलता है कि भारतीय महिलाएं अब उतनी फर्टाइल नहीं रहीं जितनी पहले हुआ करती थीं. आजकल, 20 और 30 की उम्र में ही युवा पुरुष और महिलाएं बच्चे पैदा करने के लिए फर्टिलिटी क्लीनिक में मदद ले रहे हैं.
इनफर्टिलिटी को अक्सर सिर्फ प्रजनन अंगों की सेहत से जुड़ी समस्या के तौर पर देखा जाता है, हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे शरीर की मेटाबोलिक प्रक्रियाओं से जुड़ा एक साइलेंट संकट भी है. वे है इंसुलिन रेजिस्टेंस…
मॉडर्न लाइफस्टाइल, तनाव और अनहेल्दी खान-पान की आदतों के कारण होने वाली ‘इंसुलिन रेजिस्टेंस’ की समस्या फर्टिलिटी कम होने का एक बड़ा कारण बनती जा रही है. नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसीन के मुताबिक, इंसुलिन रेजिस्टेंस और इनफर्टिलिटी की समस्याओं के बीच संबंध पाया गया है. ऐसे में, इस खबर में विस्तार से जानिए यह एक दूसरे से कैसे जुड़े हैं.
इंसुलिन रेजिस्टेंस क्या है
शरीर इंसुलिन नाम का एक हार्मोन बनाता है ताकि सेल्स खून से ज्यादा ग्लूकोज (शुगर) सोख सकें. लेकिन, जब शरीर के सेल्स इंसुलिन पर रिस्पॉन्ड करना बंद कर देते हैं और इसके लिए रेजिस्टेंट हो जाते हैं, तो इस कंडीशन को ‘इंसुलिन रेजिस्टेंस’ कहा जाता है. इस कंडीशन से जुड़ा रिस्क यह है कि शुरुआती स्टेज में कोई लक्षण नहीं दिखते. किसी व्यक्ति को तब तक पता भी नहीं चलता कि उसे इंसुलिन रेजिस्टेंस या प्री-डायबिटीज है जब तक उसे पूरी तरह से डायबिटीज न हो जाए.
पोषण की कमी- बहुत से लोग मानते हैं कि सिर्फ मीठी चीजों से परहेज करने से ही ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल में रहता है. हालांकि, वे अक्सर कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फैट और फाइबर का सही संतुलन बनाए रखने की अहमियत को नजरअंदाज कर देते हैं. कार्बोहाइड्रेट शरीर को ऊर्जा देने का मुख्य स्रोत हैं. हेल्थ एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि इन्हें पूरी तरह से छोड़ने के बजाय, साबुत अनाज और फलों में पाए जाने वाले कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट को चुनना चाहिए. प्रोटीन या फाइबर के साथ कार्बोहाइड्रेट लेने से पाचन धीमा हो जाता है, जिससे ब्लड शुगर में अचानक तेजी नहीं आती. अपने नाश्ते या लंच में स्प्राउट्स, अंडे या पनीर जैसे प्रोटीन के स्रोत शामिल करें.
आप कैसे खाते हैं, यह भी मायने रखता है- बात सिर्फ इस बात की नहीं है कि हम क्या खाते हैं, बल्कि यह भी कि हम कब और कैसे खाते हैं. दिन भर लगातार कुछ न कुछ खाते रहने से इंसुलिन का लेवल बढ़ा रहता है. इससे सेल्स की इंसुलिन के प्रति सेंसिटिविटी कम हो जाती है, जिससे ‘इंसुलिन रेजिस्टेंस’ की समस्या होती है. इसलिए भोजन के बीच में कम से कम 4 से 5 घंटे का गैप रखें.
लाइफस्टाइल और हार्मोनल असंतुलन- देर रात खाना खाने से इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ता है, नींद की कमी से भूख से जुड़े हार्मोन का संतुलन बिगड़ता है, और स्क्रीन से निकलने वाली ‘ब्लू लाइट’ मेलाटोनिन को रोककर नींद में बाधा डालती है. इन सभी वजहों से आपका पाचन और ऊर्जा की खपत धीमी हो जाती है, जिससे वजन बढ़ता है. आपकी यह आदतें आपके मेटाबॉलिज्म को बुरी तरह प्रभावित कर सकती हैं.
इसके अलावा, सोने से पहले फोन पर स्क्रॉल करने से नींद की गुणवत्ता खराब होती है और कोर्टिसोल का स्तर बिगड़ता है. लगातार मानसिक तनाव और एंग्जायटी महिलाओं में एग रिलीज और पुरुषों में स्पर्म प्रोडक्शन पर बुरा असर डाल सकती है.
रातों-रात नहीं होता है जादू
अपने मेटाबॉलिज्म और फर्टिलिटी को बेहतर बनाने के लिए आपको रातों-रात अपनी पूरी जीवनशैली बदलने की जरूरत नहीं है. इसके बजाय, आप छोटे-छोटे बदलाव करके इंसुलिन सेंसिटिविटी को काफी बेहतर बना सकते हैं, जैसे काम के दौरान फोन पर बात करते हुए टहलना, हर घंटे स्ट्रेचिंग के लिए उठना और लंबे समय तक एक ही जगह पर बैठे रहने से बचना. ऑनलाइन फूड ऐप्स और आधुनिक सुविधाओं के आने से घर पर होने वाली स्वाभाविक शारीरिक गतिविधियां कम हो गई हैं, जिससे जीवनशैली ज्यादा सुस्त हो गई है.
ध्यान देने वाली बात
इंसुलिन रेजिस्टेंस की वजह से इंसुलिन का लेवल बढ़ जाता है, जो ओवरी को उत्तेजित करता है और उनमें सामान्य से ज्यादा मात्रा में मेल हार्मोन (एंड्रोजन, जैसे टेस्टोस्टेरोन) बनने लगते हैं. एंड्रोजन की यह अधिक मात्रा ही पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) का मुख्य कारण है. इससे शरीर में ये स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं. महिलाओं में अंडे ठीक से रिलीज (ओव्यूलेशन) नहीं हो पाना, चेहरे पर अनचाहे बाल उगना और वजन बढ़ना जैसी दिक्कतें भी होने लगती हैं.

