आजकल, बहुत से लोग सोमवार से शुक्रवार तक 8 से 10 घंटे या उससे भी ज्यादा समय तक कंप्यूटर के सामने बैठकर काम करते हैं. फिर, जब वीकेंड आता है, तो वे अपना ज्यादातर समय घर के अंदर आराम करते हुए (बिस्तर या सोफे) पर बिताते हैं. पहली नजर में, यह थकान मिटाने का एक सामान्य तरीका लग सकता है. लेकिन कार्डियोवैस्कुलर विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक बैठने और उसके बाद लगातार कोई शारीरिक गतिविधि न करने से शरीर में ब्लड क्लॉट बनने का खतरा बढ़ सकता है.
लगातार घंटों तक बैठे रहना और केवल वीकेंड पर आराम करना बेहद खतरनाक
पुणे के बानेर इलाके में स्थित मणिपाल हॉस्पिटल में कंसल्टेंट इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी, डॉ. अक्षय काशिद का कहना है कि शरीर में लगातार खून का बहाव जरूरी है. जब पैरों की मांसपेशियां लगातार एक्टिव रहती हैं, तो वे खून को वापस दिल तक पंप करने में मदद करती हैं. लेकिन, कई घंटों तक लगातार बैठे रहने से पैरों की नसों में खून का बहाव धीमा हो जाता है. अगर यह स्थिति पूरे हफ्ते बनी रहे और वीकेंड पर भी शारीरिक गतिविधि न के बराबर हो, तो नसों में खून जमा होने लगता है. इस स्थिति से ‘डीप वेन थ्रोम्बोसिस’ हो सकता है (यानी पैरों की गहरी नसों में खून का थक्का जमना).
कम उम्र के कामकाजी लोगों में भी बढ़ रहे हैं डीवीटी के मामले
डॉ. अक्षय काशिद कहते हैं कि यह खतरा केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में कम उम्र के कामकाजी लोगों में भी डीवीटी के मामले बढ़ रहे हैं. काम के दौरान घंटों तक डेस्क पर बैठे रहना, घर लौटने के बाद भी स्क्रीन के सामने समय बिताना और वीकेंड पर शारीरिक गतिविधि बिल्कुल न करना, शरीर के ब्लड सर्कुलेशन सिस्टम पर लगातार दबाव डालता है. अगर मोटापा, स्मोकिंग, डायबिटीज, कैंसर, हार्मोनल दवाइयों का इस्तेमाल, प्रेग्नेंसी, हाल ही में हुई सर्जरी या ब्लड क्लॉट की फैमिली हिस्ट्री जैसी दिक्कतें भी हों, तो खतरा और बढ़ जाता है.
शुरुआती चरण में बिल्कुल भी दिखाई नहीं देते हैं लक्षण
डॉ. अक्षय काशिद के मुताबिक, डीवीटी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती फेज में इसके लक्षण हल्के हो सकते हैं या बिल्कुल दिखाई नहीं देते. कई लोगों में एक पैर में सूजन, दर्द, भारीपन, त्वचा का गर्म महसूस होना या लालिमा जैसे संकेत दिखाई देते हैं. सबसे गंभीर स्थिति तब होती है जब यह थक्का टूटकर फेफड़ों तक पहुंच जाता है. इसे पल्मोनरी एम्बोलिज्म कहा जाता है, जो सांस फूलना, अचानक सीने में दर्द, तेज धड़कन, खांसी में खून आना और गंभीर मामलों में जानलेवा स्थिति पैदा कर सकता है. इसलिए पैरों में लगातार सूजन या अचानक सांस लेने में तकलीफ जैसे लक्षणों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
बचाव के लिए क्या करना जरूरी
इस स्थिति से बचने के लिए, पूरे हफ्ते शरीर को एक्टिव रखना बहुत जरूरी है. लगातार 45 से 60 मिनट तक बैठे रहने के बजाय, बीच-बीच में थोड़ा टहलने, पैरों को स्ट्रेच करने, सीढ़ियां चढ़ने और खूब पानी पीने से ब्लड सर्कुलेशन अच्छा बना रहता है. वीकेंड का समय सिर्फ आराम करने के लिए ही नहीं, बल्कि हल्की-फुल्की फिजिकल एक्टिविटीज जैसे तेज चलना, साइकिल चलाना, तैराकी या योग करने के लिए भी इस्तेमाल करना चाहिए. पांच दिन तक बिल्कुल भी एक्टिव न रहने के बाद, सिर्फ एक या दो दिन हेवी एक्सरसाइज करना शरीर के लिए पर्याप्त नहीं माना जाता है.
DVT) और PE का कैसे लगाया जाता है पता
डॉ. अक्षय काशिद का कहना है कि मेडिकल प्रैक्टिस में डीप वेन थ्रोम्बोसिस और पल्मोनरी एम्बोलिज्म (PE) का पता लगाने के लिए सबसे पहले डॉपलर अल्ट्रासाउंड से नसों की जांच करते हैं. जरूरत पड़ने पर, और भी टेस्ट (जैसे ब्लड टेस्ट और CT पल्मोनरी एंजियोग्राफी) किए जा सकते हैं, खासकर तब जब पल्मोनरी एम्बोलिज्म का शक हो.
इलाज की शुरुआत आमतौर पर ब्लड थिनर
दवाओं से की जाती है, जो थक्के को बढ़ने से रोकती हैं और नए थक्के बनने का खतरा कम करती हैं. कुछ मरीजों को कम्प्रेशन स्टॉकिंग्स पहनने की सलाह दी जाती है ताकि पैरों में खून का प्रवाह बेहतर बना रहे और भविष्य में कठिनाईयां कम हों.
कब पड़ सकती है एडवांस्ड इलाज की जरूरत
डॉ. अक्षय काशिद के अनुसार, अगर क्लॉट बड़ा है, तेजी से बढ़ रहा है, या इसके फेफड़ों तक पहुंचने का ज्यादा खतरा है, तो एडवांस्ड इलाज की जरूरत पड़ सकती है. ऐसे मामलों में, कैथेटर-डायरेक्टेड थ्रोम्बोलाइसिस के जरिए सीधे नस में दवा पहुंचाकर क्लॉट को घुलाने की कोशिश की जाती है. कुछ मरीजों का मिनिमली इनवेसिव प्रोसीजर (कम चीर-फाड़ वाला तरीका) किया जाता है, जैसे कि मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी, जिसमें खास उपकरणों का इस्तेमाल करके क्लॉट को हटाया जाता है. जिन मरीजों को खून पतला करने वाली दवाएं नहीं दी जा सकतीं या जिन्हें बार-बार क्लॉट बनने का खतरा होता है, उनके फेफड़ों तक क्लॉट को पहुंचने से रोकने के लिए इन्फीरियर वेना कावा (IVC) फिल्टर लगाया जा सकता है. ओपन सर्जरी की जरूरत बहुत कम पड़ती है और यह सिर्फ कुछ खास, गंभीर मामलों में ही की जाती है.

