– आचार्य पं गिरीश पाण्डेय
“करना हो राहु को अनुकूल
तो करना नित्य उपाय…
शिव और भैरव के मंदिर में
जाकर शीश नवाय…
सिर से 7 बार वारकर
सतनजा पंछियों को नित्य खिलाय…”
यह पंक्तियाँ ज्योतिष शास्त्र के उस जटिल ग्रह राहु के शमन का सरल और सटीक मार्ग प्रशस्त करती हैं, जिसे छाया ग्रह और भ्रम का कारक माना जाता है।
ज्योतिष शास्त्र में राहु को एक ऐसा मायावी ग्रह माना गया है जो यदि प्रतिकूल हो, तो व्यक्ति के जीवन में अचानक मानसिक भ्रम, अज्ञात भय, और बनते कार्यों में अप्रत्याशित बाधाएं उत्पन्न कर देता है। राहु का प्रभाव सीधे व्यक्ति की बुद्धि और उसके निर्णय लेने की क्षमता पर पड़ता है। प्रस्तुत पंक्तियाँ राहु को शांत और अनुकूल करने के लिए तीन मुख्य स्तंभों पर आधारित मार्ग बताती हैं: देव-शरण, ऊर्जा का शोधन और जीव-सेवा।
1. देव शरणागति: शिव और भैरव की महिमा
राहु को नियंत्रित करने की शक्ति केवल उन देवताओं के पास है जो काल और तामसी ऊर्जाओं के स्वामी हैं। राहु के अधिपति देवता भगवान शिव हैं और उनके रौद्र स्वरूप काल भैरव को राहु का नियंत्रक माना गया है।
- शिव मंदिर: राहु ‘विष’ के समान है और महादेव ‘नीलकंठ’ हैं। शिव के मंदिर में शीश नवाने का अर्थ है—अपनी अहंकार और भ्रमित बुद्धि को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देना। शिवलिंग पर जलाभिषेक करने से राहु की अग्नि शांत होती है।
- भैरव दर्शन: शास्त्र कहते हैं कि राहु की दशा या अंतर्दशा में यदि भैरव जी की उपासना की जाए, तो जातक के शत्रु और बाधाएं स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं। मंदिर जाकर शीश नवाना एक मनोवैज्ञानिक समर्पण है, जो व्यक्ति के भीतर के ‘राहु जनित’ अहंकार को कम करता है।
2. ऊर्जा का शोधन: सात बार वारने का विज्ञान
पंक्तियों में ‘सिर से 7 बार वारकर’ की प्रक्रिया एक प्रकार की ऊर्जा शुद्धि (Energy Cleansing) है। राहु का मुख्य निवास मनुष्य के सिर (मस्तिष्क) में माना गया है।
- नकारात्मकता का निष्कासन: जब हम किसी वस्तु (जैसे सतनजा या नारियल) को अपने सिर से सात बार वारते हैं, तो वह प्रक्रिया हमारे आभामंडल (Aura) में जमी हुई राहु की नकारात्मक तरंगों को उस वस्तु में स्थानांतरित कर देती है।
- घड़ी की दिशा या विपरीत: सामान्यतः राहु के लिए इसे ‘उल्टा’ (Anti-clockwise) वारा जाता है ताकि दोषों का निवारण हो सके। यह एक प्राचीन तांत्रिक और ज्योतिषीय उपाय है जो तत्काल मानसिक शांति प्रदान करता है।
3. जीव सेवा: सतनजा और पक्षियों का दाना
सतनजा (सात प्रकार के अनाज का मिश्रण) राहु के दान की सबसे प्रभावशाली सामग्री मानी गई है। राहु का संबंध उन जीवों से भी है जो आकाश में विचरते हैं या जिन्हें समाज उपेक्षित करता है।
- सतनजा का प्रतीकात्मक अर्थ: सात अनाज जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं और ग्रहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन्हें मिलाकर दान करने से समस्त ग्रहों का संतुलन बनता है।
- पक्षियों को खिलाना: आकाशचारी पक्षियों को दाना खिलाना जातक की कुंडली के अवरुद्ध रास्तों को खोलता है। जैसे-जैसे पंछी उस अनाज को चुगते हैं, वैसे-वैसे व्यक्ति के संचित कर्मों का भार हल्का होता जाता है। यह ‘नित्य उपाय’ राहु की क्रूरता को सौम्यता में बदल देता है।
निष्कर्ष: निरंतरता ही सफलता की कुंजी है
इन पंक्तियों का सबसे महत्वपूर्ण शब्द है—‘नित्य’। ज्योतिषीय उपाय कोई जादू नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक चिकित्सा है। राहु जैसे ग्रह को अनुकूल करने के लिए धैर्य और निरंतरता की आवश्यकता होती है।
जब कोई जातक प्रतिदिन शिव-भैरव के चरणों में झुकता है और निस्वार्थ भाव से पक्षियों की सेवा करता है, तो राहु उसे भ्रमित करने के बजाय ‘अचानक धन लाभ’ और ‘कुशाग्र बुद्धि’ देने वाला ग्रह बन जाता है। अंततः, राहु को अनुकूल करना केवल ग्रहों की शांति नहीं, बल्कि अपनी वृत्तियों और कर्मों का शुद्धिकरण है।
पं. गिरीश पाण्डेय
एस्ट्रो-गुरू, भागवत-व्यास
एस्ट्रो- सेज पैनल -मेंबर
सचिव पुरोहित मंच
ज़िला- महासमुन्द छ.ग.
संपर्क सूत्र – 7000217167
संकट मोचन मंदिर
मण्डी परिसर,पिथौरा

