हिन्दू धार्मिक मान्यताओं में पितृ पक्ष के 16 दिन पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का समय होता है। शास्त्रों के अनुसार, इन दिनों में हमारे पूर्वजन सूक्ष्म रूप में परिवार से मिलने धरती पर आते हैं। यही कारण है कि उनके निमित्त तर्पण और श्राद्ध कर्म किया जाता है। पितरों की तृप्ति के लिए सात्विक पकवानों का भोग लगाना अनिवार्य माना गया है।
श्राद्ध की थाली के मुख्य सात्विक पकवान और उनका महत्व
पितरों की भोग थाली में लहसुन और प्याज का प्रयोग पूरी तरह वर्जित होता है। थाली में शुद्ध देसी घी और सात्विक सामग्रियों से बने भोजन को ही स्थान दिया जाता है:
गाय के दूध की खीर: श्राद्ध की थाली में मखाने या चावल की खीर का होना सबसे जरूरी माना जाता है। इसे बनाने के लिए केवल गाय के दूध का इस्तेमाल होता है, जबकि मिठास के लिए मिश्री या चीनी मिलाई जाती है।
गरमा-गरम पूड़ियां: गेहूं के आटे में हल्का मोयन और चुटकी भर नमक मिलाकर सख्त आटा गूंधा जाता है। इसके बाद शुद्ध तेल या घी में पूड़ियां तली जाती हैं।
कद्दू (कोहड़ा) की सब्जी: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बेल पर उगने वाली सब्जियों का भोग पितरों को विशेष प्रिय होता है। इसलिए कद्दू की सब्जी बिना लहसुन-प्याज के सात्विक तरीके से तैयार की जाती है।
अरबी की सब्जी: जमीन के नीचे उगने वाले कंदमूल को भी श्राद्ध भोजन में शामिल करने की परंपरा है। अरबी को हींग, अजवाइन और मेथी दाने के तड़के के साथ बनाया जाता है।
चने की सादी दाल: उबली हुई चने की दाल में देसी घी, हींग और जीरे का छौंक लगाकर थाली में परोसा जाता है।
काले तिल और गुड़ के लड्डू: काले तिल के बिना पितृ कार्य और तर्पण अधूरा माना जाता है। भुने हुए काले तिल को गुड़ और इलायची पाउडर की चाशनी में मिलाकर लड्डू बांधे जाते हैं।
सादे चावल और मौसमी फल: बिना किसी मसाले के बने सादे चावल और ताजा मौसमी फल थाली के संतुलन को पूरा करते हैं।
श्राद्ध भोजन बनाते समय ध्यान रखने योग्य बातें
भोग तैयार करते समय स्वच्छता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखें। भोजन हमेशा सात्विक वातावरण में बनाएं और पितरों को अर्पित करने से पहले इसे परिवार के सदस्यों को न परोसें। थाली तैयार होने के बाद पहला भाग गाय, कुत्ते और कौवे के लिए निकालना न भूलें।

