नई दिल्ली :- जिंदगी में कई बार परिस्थितियां इतनी मुश्किल हो जाती हैं कि इंसान खुद को हर तरफ से घिरा हुआ महसूस करने लगता है. ऐसे समय में मन में आत्महत्या का विचार भी आ सकता है, लेकिन यह स्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रहती. भावनाएं और परिस्थितियां बदल सकती हैं. विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के मौके पर आईजीएमसी शिमला के पूर्व सीनियर एमएस डॉ. रमेश चंद ने लोगों से ऐसे विचार आने पर खुद को समय देने और तुरंत कोई कदम न उठाने की अपील की है. उन्होंने कहा कि अगर आत्महत्या का विचार आए तो खुद से बस इतना कहें, “24 घंटे रुक जाओ. इस दौरान खुद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाना है और किसी अपने से बात करनी है.”
हिमाचल प्रदेश में हर महीने औसतन 68 लोग आत्महत्या करते हैं. विधानसभा में उपलब्ध तीन साल के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023, 2024 और 2025 में प्रदेश में कुल 203 लोगों ने आत्महत्या की. चिंता की बात यह है कि इनमें स्कूली बच्चे भी शामिल हैं. कुछ बच्चे परीक्षा में असफल होने के बाद इतना बड़ा कदम उठा लेते हैं, जबकि कुछ मामलों में मोबाइल न मिलने जैसी छोटी बात भी उनके लिए गंभीर स्थिति बन गई.
आत्महत्या का विचार आना कमजोरी नहीं
डॉ. रमेश चंद ने बताया कि आत्महत्या के विचार आने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति कमजोर है या उसमें कोई कमी है. कई बार इंसान किसी गहरे भावनात्मक दर्द से गुजर रहा होता है और उसे लगता है कि यह परेशानी कभी खत्म नहीं होगी. ऐसे समय में परिवार, दोस्त, चिकित्सक या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना बेहद जरूरी है. मदद मांगना कमजोरी नहीं बल्कि खुद को संभालने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है.
रिश्ता, नौकरी, पैसा और पढ़ाई बन रहे तनाव की वजह
डॉ. रमेश चंद के अनुसार, किसी व्यक्ति के मन में आत्महत्या के विचार आने के पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं. युवाओं में रिश्ते टूटने, नौकरी की परेशानी, पढ़ाई में असफलता या दूसरी निजी समस्याओं के कारण तनाव बढ़ सकता है. इसके अलावा आर्थिक परेशानी और स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी व्यक्ति को गहरे मानसिक दबाव में डाल सकती हैं. जब कई समस्याएं एक साथ सामने आती हैं तो व्यक्ति को उनसे बाहर निकलने का रास्ता दिखाई नहीं देता और आत्महत्या उसे एकमात्र विकल्प जैसी लगने लगती है.
आत्महत्या का विचार आए तो नशे से रहें दूर
आत्महत्या के विचार आने पर सबसे जरूरी है कि व्यक्ति खुद को तत्काल कोई नुकसान न पहुंचाने का फैसला करे. खुद से वादा करें कि अगले 24 घंटे तक कोई गलत कदम नहीं उठाएंगे. इस दौरान अकेले रहने के बजाय किसी भरोसेमंद व्यक्ति के साथ रहें और अपने मन की बात साझा करें. कई बार अपनी परेशानी किसी के सामने रख देने से मानसिक बोझ कम हो जाता है. ऐसी स्थिति में शराब या किसी अन्य नशीले पदार्थ से दूर रहना भी जरूरी है, क्योंकि इससे नकारात्मक विचार और मजबूत हो सकते हैं. जिस जगह व्यक्ति रह रहा है, वहां ऐसी चीजों को अपने आसपास न रखें जिनसे खुद को नुकसान पहुंचाया जा सकता है. जरूरत महसूस होने पर परिवार के किसी सदस्य, दोस्त, चिकित्सक या परामर्शदाता की मदद लें.
‘भावनाएं हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं’
डॉ. रमेश चंद ने बताया कि आज जैसा महसूस हो रहा है, जरूरी नहीं कि कल भी वैसा ही महसूस हो. गंभीर भावनात्मक संकट के दौरान सोचने और समस्याओं को देखने का नजरिया प्रभावित हो सकता है. इसलिए किसी भी स्थायी फैसले से पहले खुद को समय देना जरूरी है. परिवार और अपनों का साथ, बातचीत, चिकित्सा सहायता और सकारात्मक माहौल व्यक्ति को इस दौर से बाहर आने में मदद कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि आत्महत्या किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है. कितनी भी कठिन परिस्थिति क्यों न हो, उसके समाधान की संभावना बनी रहती है. इसलिए आत्महत्या का विचार आने पर अकेले उस विचार से लड़ने के बजाय किसी अपने तक पहुंचना चाहिए और मदद लेनी चाहिए. छोटी-छोटी अच्छी चीजों, पुराने खुशहाल पलों और भविष्य में पूरे किए जाने वाले सपनों को याद करना भी व्यक्ति को मुश्किल समय से बाहर निकलने की दिशा दे सकता है.
डॉ. रमेश चंद ने बताया कि हर साल 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है. इसका उद्देश्य आत्महत्या की रोकथाम को लेकर जागरूकता बढ़ाना और मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बातचीत को प्रोत्साहित करना है. दुनिया भर में हर साल 7 लाख से अधिक लोगों की आत्महत्या से मौत होती है. यह 15 से 29 वर्ष की उम्र के युवाओं में मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है. ऐसे में जरूरत है कि मानसिक परेशानी को छिपाने के बजाय उस पर बात की जाए और मुश्किल समय से गुजर रहे व्यक्ति को अकेला न छोड़ा जाए.

