बस्तर दशहरे की सबसे अद्भूत रस्म निशा जात्रा को मंगलवार आधी रात 2 बजे पूरे विधि विधान के साथ सम्पन्न की गई. इस रस्म को काले जादू की रस्म भी कहा जाता है. प्राचीन काल में इस रस्म को राजा महाराजा बुरी प्रेत आत्माओं से अपने राज्य की रक्षा के लिए निभाते थे. जिसमे हजारों बकरों, भैंसों यहां तक की नरबलि देने का भी इतिहास मिलता है.
अब केवल 11 बकरों की बलि
अब केवल 11 बकरों की बलि देकर इस रस्म कि अदायगी देर रात शहर अनुपमा चौक स्थित के गुड़ी मंदिर में पूरी की गई. राज महल से बस्तर राजपरिवार पैदल गाजे बाजे के साथ इस गुड़ी मंदिर में पहुंचते हैं. महाष्टमी और नवमी की आधी रात इस रस्म की अदायगी होती है. इस रस्म में बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव , बस्तर सांसद महेश कश्यप, दशहरा पर्व समिति के सदस्य, राजगुरु, जमींदार परिवार और बड़ी संख्या में बस्तरवासी और बाहर से पर्व में शामिल होने आए पर्यटक मौजूद रहे.
1301 में शुरु हुई निशा जात्रा रस्म की परंपरा
बस्तर राज परिवार सदस्य कमलचंद भंजदेव का कहना है कि इस रस्म की शुरूआत 1301 ईस्वीं में की गई थी. इस तांत्रिक रस्म को राजा महाराजा बुरी प्रेत आत्माओं से राज्य कि रक्षा के लिए अदा करते थे.
कमलचंद भंजदेव के मुताबिक सिंह द्वार, दंतेश्वरी मंदिर सहित अन्य जगहों पर भोग लगाया जाता है. यह परम्परा सदियों से चली आ रही है. अभी इस रस्म को राज्य में शांति और सुख समृद्धि बनाए रखने के लिए निभाया जाता है. इस अनोखी रस्म को देखने देश-विदेश से भारी संख्या में पर्यटक गुड़ी मंदिर पहुंचते हैं.

