पकौड़े तलने के बाद बचे हुए तेल का दोबारा इस्तेमाल करना भले ही पैसे बचाने का एक तरीका लगे, लेकिन इससे आपकी सेहत को भारी नुकसान हो सकता है. कई भारतीय घरों में खाना पकाने वाले तेल का दोबारा इस्तेमाल करना एक आम बात है. चाहे पूरियां, भजिया, समोसे या पकौड़े तलने हों, अक्सर बचे हुए तेल को रख लिया जाता है और फिर से इस्तेमाल किया जाता है. पुणे के M.O.C कैंसर केयर में कैंसर विशेषज्ञ डॉ. निखिल शिरसी का कहना है कि हालांकि, यह किफायती लग सकता है, लेकिन तेल को बार-बार बहुत तेज आंच पर गर्म करने से उसकी रासायनिक संरचना बदल जाती है और उसमें हानिकारक तत्व बन जाते हैं, जिससे गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.
जब तेल को बार-बार गर्म किया जाता है तो क्या होता है
डॉ. निखिल शिरसी के अनुसार, जब खाना पकाने वाला तेल उच्च तापमान, हवा और खाने के कणों के संपर्क में आता है, तो वह धीरे-धीरे टूटने लगता है. बार-बार गर्म करने से एल्डिहाइड और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs) जैसे कंपाउंड बन सकते हैं. कुछ अध्ययनों में इन्हें DNA को नुकसान पहुंचाने और कैंसर का कारण बनने की संभावना से जोड़ा गया है.
शोध क्या कहता है
2019 में ‘क्रिटिकल रिव्यूज इन फूड साइंस एंड न्यूट्रिशन’ जर्नल में प्रकाशित एक व्यापक समीक्षा अध्ययन के अनुसार, खाना पकाने में इस्तेमाल होने वाले वनस्पति तेलों को बार-बार गर्म करने से और उनसे निकलने वाले धुएं से कैंसर, जीनोटॉक्सिसिटी या कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान और म्यूटेशन का खतरा काफी बढ़ जाता है. हालांकि, बार-बार गर्म किए गए तेल और इंसानों में कैंसर के बीच कोई सीधा कारण-प्रभाव संबंध अभी तक पूरी तरह से साबित नहीं हुआ है, क्योंकि मौजूदा निष्कर्ष मुख्य रूप से प्रयोगशाला और जानवरों पर किए गए अध्ययनों पर आधारित हैं.
प्रयोगशाला में (जैसे चूहों पर) इस्तेमाल किए गए इन तेलों की मात्रा और सांद्रता, इंसानों द्वारा अपने दैनिक आहार में ली जाने वाली मात्रा से काफी अलग होती है. इंसानों में कैंसर कई कारणों से हो सकता है, जिनमें आनुवंशिकी (जेनेटिक्स), जीवनशैली, धूम्रपान और खान-पान की आदतें शामिल हैं. इसलिए, यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि खाना पकाने वाले तेल का दोबारा इस्तेमाल ही कैंसर का एकमात्र या सीधा कारण है.
बार-बार गर्म किए गए तेल के इस्तेमाल से कौन-से कैंसर हो सकते हैं
बार-बार गर्म किए गए तेल का उपयोग करने और इससे निकलने वाले धुएं को सांस के जरिए अंदर लेने से शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और DNA को नुकसान पहुंचता है. इससे नीचे दिए गए कैंसर का खतरा काफी बढ़ जाता है:
लंग कैंसर: तेल को बार-बार गर्म करने पर जो हानिकारक धुआं और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs) निकलते हैं, उन्हें सांस के जरिए अंदर लेने से फेफड़ों पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है.
कोलोरेक्टल कैंसर: खराब हो चुके या ऑक्सीडाइज्ड तेल का लगातार सेवन करने से पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचता है और आंतों की कोशिकाओं के DNA में बदलाव आ जाता है, जिससे कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा बढ़ जाता है.
ब्रेस्ट कैंसर: वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि बार-बार गर्म किए गए तेल में मौजूद टॉक्सिन्स का लंबे समय तक सेवन करने से ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ सकता है.
प्रोस्टेट कैंसर: इस तरह के तेल का लंबे समय तक सेवन करने से शरीर में इन्फ्लेमेशन और जीनोटॉक्सिसिटी बढ़ती है, जिससे प्रोस्टेट कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है.
मुंह और पाचन तंत्र के कैंसर: तेल को बार-बार गर्म करने से फ्री रेडिकल्स, ट्रांस फैट्स और टोटल पोलर कंपाउंड्स (TPCs) बनते हैं, जो मुंह और पूरे पाचन तंत्र की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं.
क्या सच में तेल को बार-बार गर्म करना खतरनाक है
डॉ. निखिल शिरसी कहते हैं कि जरूरी नहीं, यह कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे कि तेल को कितना गर्म किया गया था, उसे कितनी देर तक गर्म किया गया, तेल किस प्रकार का है, उसमें क्या तला जा रहा है, और उसे कितनी बार इस्तेमाल किया गया है. अगर तेल बहुत ज्यादा गर्म हो गया है, उसका रंग गहरा हो गया है, वह असामान्य रूप से गाढ़ा हो गया है, उसमें से खराब गंध आ रही है, या बहुत ज्यादा धुआं निकल रहा है, तो उसे फेंक देना चाहिए.
FSSAI की सलाह क्या है
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण की सलाह है कि खाना पकाने वाले तेल का दोबारा इस्तेमाल करने से जितना हो सके बचना चाहिए. अगर तेल को दोबारा इस्तेमाल करना जरूरी हो जाए, तो FSSAI के दिशा-निर्देशों के अनुसार, इसे तीन बार से ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, हालांकि, इसे सिर्फ एक बार इस्तेमाल करना ही सबसे अच्छा माना जाता है. FSSAI ने ‘टोटल पोलर कंपाउंड्स’ (TPCs) के लिए 25 फीसदी की सीमा तय की है, जो तेल के खराब होने पर बनते हैं. अगर इन कंपाउंड्स का स्तर 25 फीसदी से ज्यादा हो जाता है, तो उस तेल को खाने के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता है.
भारतीय घरों में इस खतरे को कैसे कम किया जा सकता है
डॉ. निखिल शिरसी के अनुसार, सबसे आसान तरीका यह है कि खाना बनाते समय केवल उतनी ही मात्रा में तेल का इस्तेमाल करें, जितनी वास्तव में जरूरत हो. बार-बार डीप-फ्राइंग करने के बजाय, स्टीमिंग, ग्रिलिंग, बेकिंग या शैलो-फ्राइंग जैसे तरीकों को अपनाएं. तेल को इतना ज्यादा गर्म न करें कि उसमें से धुआं निकलने लगे, और दोबारा इस्तेमाल के लिए ताजे तेल को पहले से इस्तेमाल किए गए तेल के साथ न मिलाएं.
अगर आपने कभी-कभार ऐसा खाना खा लिया है जो दोबारा इस्तेमाल किए गए तेल में बना हो, तो घबराने की कोई बात नहीं है. हालांकि, बार-बार डीप-फ्राइंग करना या बचे हुए तेल से खाना पकाने की आदत डालना ठीक नहीं है. सिर्फ़ खाना पकाने के तेल पर थोड़ा सा बचाने के लिए लंबे समय की सेहत से समझौता नहीं करना चाहिए.

