पुरुषोत्तम मास (जिसे अधिक मास या मलमास भी कहा जाता है) हिंदू पंचांग का एक अत्यंत विशिष्ट और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण समय है। स्वयं को ईश्वर के करीब लाने और जीवन की भागदौड़ से हटकर आत्म-चिंतन करने का एक दिव्य अवसर है। वर्ष 2026 में पुरुषोत्तम मास (अधिक मास या मल मास) 17 मई 2026 (रविवार) से शुरू होकर 15 जून 2026 (सोमवार) तक रहेगा। यह ज्येष्ठ महीने का अधिक मास है।
आइए पुरुषोत्तम मास के विभिन्न पहलुओं पर एक विस्तृत विचार करें:
1. पुरुषोत्तम मास: समय का आध्यात्मिक संतुलन
हिंदू गणना के अनुसार, चंद्र वर्ष और सौर वर्ष के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। इस अंतर को पाटने के लिए हर तीसरे वर्ष (लगभग 32 माह, 16 दिन और 4 घटी के बाद) एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है। वैज्ञानिक रूप से यह समय का सामंजस्य है, लेकिन आध्यात्मिक रूप से यह ‘अतिरिक्त’ फल पाने का द्वार है।
2. ‘मलमास’ से ‘पुरुषोत्तम’ बनने की कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस महीने का कोई स्वामी ग्रह या देवता नहीं था, जिस कारण इसे ‘मलमास’ (अपवित्र महीना) कहकर तिरस्कृत किया गया। दुखी होकर यह मास भगवान विष्णु के पास गया। विष्णु जी ने अपनी असीम कृपा दिखाते हुए इसे अपना सर्वश्रेष्ठ नाम ‘पुरुषोत्तम’ दिया और घोषणा की:
“जो इस मास में मेरी भक्ति करेगा, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अक्षय पुण्य प्राप्त करेगा।”
3. इस मास का महत्व और विशेषताएँ
पुरुषोत्तम मास को अन्य महीनों की तुलना में अधिक फलदायी माना जाता है। इसकी कुछ मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- पुण्य की अधिकता: इस माह में किए गए जप, तप और दान का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक मिलता है।
- आत्म-शुद्धि का समय: चूँकि इस दौरान विवाह, मुंडन या गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं, इसलिए सारा ध्यान बाहरी प्रदर्शन से हटकर अंतर्मुखी भक्ति पर केंद्रित हो जाता है।
- श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण: इस मास में भगवान कृष्ण (पुरुषोत्तम) की कथा सुनने और उनके मंत्रों का जाप करने का विशेष विधान है।
4. आध्यात्मिक अभ्यास और दिनचर्या
यदि आप इस मास का पूर्ण लाभ उठाना चाहते हैं, तो निम्नलिखित गतिविधियों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना सकते हैं:
पूजा और उपासना
- मंत्र जाप: ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ या ‘श्री कृष्ण शरणं मम’ का जाप।
- दीपदान: शाम के समय तुलसी के पौधे या मंदिर में घी का दीपक जलाना।
- व्रत और नियम: सात्विक आहार ग्रहण करना और यथाशक्ति उपवास रखना।
दान का महत्व
इस मास में मालपुआ, वस्त्र, फल और धार्मिक पुस्तकों के दान की विशेष महिमा है। विशेषकर तांबे के बर्तन में मालपुआ रखकर दान करना शुभ माना जाता है।
5. समकालीन संदर्भ में पुरुषोत्तम मास
आज के आधुनिक और तनावपूर्ण जीवन में पुरुषोत्तम मास एक ‘स्पिरिचुअल डिटॉक्स’ की तरह है। यह हमें सिखाता है कि:
- ठहराव आवश्यक है: दुनिया की दौड़ से अलग हटकर अपनी जड़ों और ईश्वर की ओर मुड़ना जरूरी है।
- कोई भी ‘मल’ (अशुद्ध) नहीं है: जिस तरह ईश्वर ने उपेक्षित मलमास को अपना नाम देकर सर्वश्रेष्ठ बना दिया, उसी तरह सच्ची भक्ति किसी भी साधारण मनुष्य को महान बना सकती है।
निष्कर्ष
पुरुषोत्तम मास ईश्वर की ओर से दिया गया एक ‘ग्रेस पीरियड’ (अनुग्रह काल) है। यह समय है अपने संकल्पों को दोहराने का, अपनी त्रुटियों के लिए क्षमा मांगने का और अपने भीतर के ‘पुरुष’ को ‘पुरुषोत्तम’ (श्रेष्ठ पुरुष) बनाने की दिशा में एक कदम बढ़ाने का।
“इस मास की महिमा शब्दों से परे है; यह केवल अनुभव करने और भक्ति के सागर में डूबने का समय है।”
पं. गिरीश पाण्डेय
एस्ट्रो-गुरू, भागवत-व्यास
एस्ट्रो- सेज पैनल -मेंबर
सचिव पुरोहित मंच
ज़िला- महासमुन्द छ.ग.
संपर्क सूत्र – 7000217167
संकट मोचन मंदिर
मण्डी परिसर,पिथौरा
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