मानसून के मौसम में रैशेज और खुजली होना आम बात है. इस मौसम के दौरान ज्यादा नमी, बैक्टीरिया और बाढ़ के गंदे पानी में छिपी नुकीली चीजे रैशेज, खुजली और चोट लगने का मुख्य कारण होती हैं. इस मौसम में पसीना आसानी से नहीं सूखता, जिससे त्वचा की सुरक्षा करने वाली परत कमजोर हो जाती है और फंगल व बैक्टीरियल इन्फेक्शन तेजी से फैलते हैं.
हालांकि, एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि इन समस्याओं को मामूली घाव या रैशेज समझकर नजरअंदाज न करें. उनका कहना है कि छोटे कट, खरोंच, कीड़े के काटने और त्वचा में दरारों के जरिए बैक्टीरिया शरीर में घुस सकते हैं. इससे त्वचा की गहरी परतों में इन्फेक्शन हो सकता है, जिससे ‘सेल्युलाइटिस’ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. भले ही शुरुआत में यह एक छोटे लाल निशान जैसा दिखे, लेकिन सूजन, गर्मी और दर्द धीरे-धीरे बढ़ सकते हैं और आस-पास के इलाकों में फैल सकते हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि सही समय पर इलाज से सेल्युलाइटिस को कंट्रोल किया जा सकता है.
सेल्युलाइटिस क्या है
सेल्युलाइटिस एक गंभीर बैक्टीरियल इन्फेक्शन है जो त्वचा की गहरी परतों और उसके नीचे के टिश्यू को प्रभावित करता है. यह शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है. अगर समय पर इसकी पहचान और इलाज न किया जाए, तो इन्फेक्शन के ब्लडस्ट्रीम या लिम्फ नोड्स तक फैलने का खतरा रहता है. विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में, यह कभी-कभी जानलेवा भी हो सकता है.
इसके लक्षण इस प्रकार हैं…
त्वचा के किसी खास हिस्से में लालिमा
छूने पर त्वचा का गर्म महसूस होना
सूजन, दर्द और जलन का एहसास
त्वचा में कसाव
लालिमा का धीरे-धीरे फैलना
ठंड लगना, बुखार और सुस्ती जैसे लक्षण भी नजर आते हैं.
किन लोगों को रहता है ज्यादा खतरा
किसी भी उम्र के व्यक्ति को सेल्युलाइटिस का खतरा हो सकता है. हालांकि, जिन लोगों को नीचे बताई गई समस्याएं हैं, उन्हें सेल्युलाइटिस का खतरा ज्यादा हो सकता है.
डायबिटीज
खुले घाव
कीड़े या जानवर का काटना
एक्जिमा
पैरों में लंबे समय से सूजन
कमजोर इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता)
बुजुर्ग और मोटापे से ग्रस्त लोगों को भी इसका ज्यादा खतरा होता है
जानकारों का कहना है कि जिन लोगों को पहले सेल्युलाइटिस हो चुका है, उन्हें ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए. अगर त्वचा को कोई नुकसान पहुंचता है, तो उन्हें सेल्युलाइटिस होने का खतरा ज्यादा हो सकता है.
अपने हाथों और पैरों का ध्यान रखें
जानकारों का कहना है कि सेल्युलाइटिस शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है, लेकिन यह ज्यादातर पैरों और हाथों में होता है. अगर चेहरे या आंखों के आस-पास इन्फेक्शन हो जाए, तो सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है.
खरोंच और कुछ फंगल इन्फेक्शन की वजह से पैरों में छोटी-मोटी चोटें और दरारें पड़ने का खतरा बढ़ जाता है. अगर इन समस्याओं को नजरअंदाज किया जाए या मामूली समझकर छोड़ दिया जाए, तो दिक्कत बढ़ सकती है.
डायबिटीज के मरीजों को सलाह दी जाती है कि वे रोज अपने पैरों की जांच करें. उन्हें पैरों की उंगलियों के बीच, तलवों पर या एड़ी के पास किसी भी दरार या घाव पर नजर रखनी चाहिए.
बहुत ज्यादा सूखी त्वचा की वजह से पड़ने वाली दरारें बैक्टीरिया के शरीर में घुसने का जरिया बन सकती हैं. साथ ही, जिन लोगों के पैरों में अक्सर सूजन रहती है, उन्हें त्वचा से जुड़ी समस्याओं का खतरा ज्यादा होता है।
डायबिटीज की वजह से पैरों में संवेदनशीलता कम हो जाती है, इसलिए कुछ लोग छोटी-मोटी चोटों या छालों पर तुरंत ध्यान नहीं दे पाते. नतीजतन, उनके घाव भरने में ज्यादा समय लगता है.
