लंग कैंसर दुनिया भर में होने वाले सबसे आम कैंसर में से एक है. कई स्टडीज से पता चलता है कि इससे हर साल 1.8 मिलियन लोगों की जान जाती है. वैसे तो स्मोकिंग को लंग कैंसर का मुख्य कारण माना जाता है, लेकिन कुछ लोग जिंदगी भर स्मोकिंग करते हैं और उन्हें यह बीमारी नहीं होती, जबकि कुछ लोग कभी स्मोकिंग न करने के बावजूद इसके चपेट में आ जाते हैं. ऐसा क्यों होता है? इस सवाल का जवाब अब सबके सामने आ गया है.
दरअसल, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और दूसरे इंस्टीट्यूशन्स के रिसर्चर्स द्वारा की गई एक हालिया स्टडी, जो मशहूर जर्नल नेचर में छपी है, इस बात का पहला सीधा सबूत देती है कि स्मोकिंग से कैंसर होता है या नहीं, यह तय करने में हमारी अंदरूनी जेनेटिक बनावट अहम भूमिका निभाती है. अब तक, साइंटिस्ट्स का मानना था कि कैंसर मुख्य रूप से एनवायर्नमेंटल फैक्टर्स (जैसे सिगरेट का धुआं या सूरज से आने वाली अल्ट्रावॉयलेट किरणें) और सेल्स के अंदर होने वाले अपने आप होने वाले म्यूटेशन (गलतियां) की वजह से होता है. हालांकि, इस रिसर्च ने दिखाया है कि हमारी अंदरूनी जेनेटिक बनावट यह तय करने में अहम भूमिका निभाती है कि शरीर बाहरी खतरों पर कैसे रिस्पॉन्ड करता है.
इस वैज्ञानिक खोज के मुख्य पहलू और नतीजे इस प्रकार हैं…
सिगरेट के धुएं में कई हानिकारक कार्सिनोजेन्स (कैंसर पैदा करने वाले तत्व) होते हैं जो फेफड़ों की कोशिकाओं के DNA को नुकसान पहुंचाते हैं. इस नई रिसर्च से पता चलता है कि कुछ लोगों में जन्मजात DNA रिपेयर सिस्टम होता है जो बहुत मजबूत और एक्टिव होता है. यह सिस्टम धुएं से हुए नुकसान को तुरंत ठीक करता है और फेफड़ों की कोशिकाओं में हानिकारक म्यूटेशन को जमा होने से रोकता है. इससे पता चलता है कि क्यों कुछ लोग जीवन भर धूम्रपान करने के बावजूद फेफड़ों के कैंसर से बचे रहते हैं.
इसके विपरीत, जो लोग धूम्रपान नहीं करते, लेकिन जिनमें जन्मजात जेनेटिक कमियां या कमजोर DNA रिपेयर क्षमता होती है, वे पर्यावरण के अन्य फैक्टर्स के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं. ऐसे लोगों में, पैसिव स्मोकिंग (दूसरों के धुएं के संपर्क में आना), वायु प्रदूषण या रेडॉन गैस जैसे तत्वों के मामूली संपर्क से भी DNA म्यूटेशन तेजी से बढ़ सकता है, जिससे कैंसर हो सकता है. वैज्ञानिकों की यह खोज चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी उपलब्धि है. बता दें, यह रिसर्च चूहों पर की गई थी, इंसानों पर ट्रायल अभी बाकी हैं.
यह खोज प्रिसिजन मेडिसिन और पर्सनलाइज्ड इलाज के क्षेत्र में तरक्की का रास्ता बनाएगी. भविष्य में, मरीज के जन्मजात जेनेटिक प्रोफाइल की जांच करके, डॉक्टर पहले से पता लगा पाएंगे कि किस तरह के कैंसर का सबसे ज्यादा खतरा है और कौन सी दवा सबसे असरदार होगी. इससे कैंसर की रोकथाम और सटीक इलाज काफी आसान हो जाएगा.
इन नतीजों से कैंसर की जांच के भविष्य के तरीकों में आ सकता है बड़ा बदलाव
इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे रिसर्चर्स का कहना है कि अगर जेनेटिक बैकग्राउंड कैंसर के जोखिम और ट्यूमर के विकास के तरीके, दोनों पर असर डालता है, तो भविष्य में कैंसर से बचाव और स्क्रीनिंग की रणनीतियों में विरासत में मिले जेनेटिक्स और आबादी की विविधता को ध्यान में रखना होगा. वहीं, एक और रिसर्चर ने बताया कि इस स्टडी से पता चलता है कि DNA को नुकसान पहुंचने के बाद, हमारे विरासत में मिले जीन कैंसर के पनपने पर कितना बड़ा असर डाल सकते हैं. इंसानों पर इसके असर को समझने के लिए और रिसर्च की जरूरत है, लेकिन इस खोज से कैंसर की शुरुआत के बारे में हमारी समझ बदल सकती है और इस बीमारी से निपटने के ज्यादा असरदार और सटीक तरीके मिल सकते हैं.

