किडनी हमारे शरीर के सबसे जरूरी अंगों में से एक है, जो पूरी हेल्थ को बैलेंस बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है. हमारी किडनी चौबीसों घंटे काम करती है, वे वेस्ट प्रोडक्ट्स को फिल्टर करती हैं, शरीर में फ्लूइड बैलेंस बनाए रखती हैं, ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करती हैं, और हड्डियों और ब्लड सेल्स को हेल्दी रखने में मदद करती हैं. हालांकि, जब किडनी का काम कम होने लगता है, तो शरीर अक्सर बहुत कम चेतावनी के सिग्नल देता है. इसलिए, किडनी की बीमारी को अक्सर ‘साइलेंट किलर’ माना जाता है क्योंकि शुरुआती चरणों में यह बहुत कम या अस्पष्ट संकेत देती है, जिससे लोग इसे मामूली थकान या कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.
लेकिन, एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि इन संकेतों को नजरअंदाज करना खतरनाक है. ऐसा इसलिए है क्योंकि जब किडनी की खराबी कुछ महीनों से ज्यादा समय तक रहती है, तो यह क्रोनिक किडनी डिजीज बन जाती है. आजकल, क्रोनिक किडनी डिजीज दुनिया भर में एक बढ़ती हुई चिंता बन गई है. द लैंसेट में छपी लेटेस्ट CKD सीरीज के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 788 से 844 मिलियन वयस्क क्रोनिक किडनी डिजीज से पीड़ित हैं, और अनुमान है कि 2040 तक, यह दुनिया भर में मौत का पांचवां सबसे बड़ा कारण बन जाएगा.
क्रोनिक किडनी डिजीज क्या है
क्रोनिक किडनी डिजीज तब होती है जब किडनी कुछ महीनों से ज्यादा समय तक खराब रहती है. CKD एक गंभीर स्थिति है जिसमें किडनी धीरे-धीरे खराब होने लगती है और तीन महीने या उससे ज्यादा समय तक खून को ठीक से फिल्टर नहीं कर पाती है. इसके मुख्य कारणों में डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर शामिल हैं. हमारी किडनी वेस्ट और ज्यादा फ्लूइड को फिल्टर करके खून को साफ करती है, जिसे फिर यूरिन के रूप में शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है. किडनी ब्लड प्रेशर को रेगुलेट करने और सॉल्ट और मिनरल का बैलेंस बनाए रखने में मदद करती है. किडनी शरीर को रेड ब्लड सेल्स बनाने और हड्डियों को मजबूत रखने में भी मदद करती है.
क्रोनिक किडनी डिजीज के लक्षण
क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) को साइलेंट किलर माना जाता है क्योंकि इसके शुरुआती स्टेज (स्टेज 1 और 2) में कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते हैं. जब किडनी का काम करना काफी कम हो जाता है, तभी इसके लक्षण गंभीर रूप से दिखते हैं.जिसमें शामिल है…
मतली आना
उल्टी आना
भूख न लगना
लगातार थकान और कमजोरी
नींद की समस्या
दिमाग की तेजी में कमी
हाई ब्लड प्रेशर जिसे मैनेज करना मुश्किल हो
अगर फेफड़ों में पानी जमा हो जाना, जिससे सांस लेने में तकलीफ होना
मूड में बदलाव
मुंह में धातु जैसा स्वाद
रात में मांसपेशियों में ऐंठन
झागदार यूरिन
क्रोनिक किडनी डिजीज के कारण
क्रोनिक किडनी रोग के कारणों में शामिल हैं…
टाइप 1 या टाइप 2 डायबिटीज
हाई ब्लड प्रेशर
कुछ ऑटोइम्यून बीमारियां, जैसे ल्यूपस, सारकॉइडोसिस और सोजग्रेन सिंड्रोम
पॉलीसिस्टिक किडनी रोग या किडनी की अन्य वंशानुगत बीमारियां
मूत्र मार्ग में लंबे समय तक रुकावट, जो बढ़े हुए प्रोस्टेट या मूत्र मार्ग में ट्यूमर जैसी स्थितियों के कारण होती है.
वेसिकोयूरेटेरल रिफ्लक्स, एक ऐसी स्थिति जिसके कारण पेशाब वापस किडनी में चला जाता है.
कुछ दवाएं, जैसे लिथियम, आइबुप्रोफेन की ज्यादा खुराक या अन्य नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाएं, और ऐसी दवाएं जो इम्यून सिस्टम को दबाती हैं
क्यों बढ़ रहे CKD के मामले
द लैंसेट की स्टडी बताती है कि क्रोनिक किडनी डिजीज का बढ़ना मॉडर्न हेल्थ ट्रेंड्स से गहराई से जुड़ा हुआ है. डायबिटीज, हाइपरटेंशन, मोटापा और दिल की बीमारी के बढ़ते रेट, साथ ही बढ़ती उम्र की आबादी और अनहेल्दी लाइफस्टाइल की आदतें, ये सभी इस बढ़ते बोझ में योगदान दे रही हैं. एक्सपर्ट्स एक और वजह की ओर भी इशारा करते हैं वे है बेहतर डिटेक्शन. बेहतर डिटेक्शन एक बड़ा गेम-चेंजर साबित हुआ है. इसकी वजह से, अब बहुत सारे लोगों में CKD का पता बहुत पहले चल रहा है. जब हेल्थकेयर सिस्टम किसी बीमारी की स्क्रीनिंग बढ़ाते हैं, तो उसके आंकड़ों में अचानक बढ़ोतरी होना नेचुरल है.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन ने हाल ही में बताया है कि डायबिटीज, हाइपरटेंशन और बढ़ती उम्र की आबादी के साथ-साथ किडनी की बीमारियां भी बढ़ रही हैं, जो दुनिया भर में पब्लिक हेल्थ के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई हैं. भारत जैसे देशों के लिए, जहां लाखों लोग डायबिटीज और हाइपरटेंशन से पीड़ित हैं, इसके असर बहुत गहरे हैं. यह क्रोनिक बीमारी न सिर्फ किडनी पर असर डालती है, बल्कि इससे दिल की बीमारी, विकलांगता, अस्पताल में भर्ती होने और समय से पहले मौत का खतरा भी बढ़ जाता है.
समय पर स्क्रीनिंग और डायग्नोसिस जरूरी
चुनौती सिर्फ CKD से प्रभावित लोगों की संख्या नहीं है. चुनौती यह भी है कि बहुत से लोगों को किडनी की बीमारी का तब तक पता नहीं चलता जब तक कि उन्हें काफी नुकसान न हो जाए. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन का कहना है कि किडनी की बीमारी अक्सर शुरुआती स्टेज में बिना लक्षण के होती है, इसलिए समय पर स्क्रीनिंग और डायग्नोसिस बहुत जरूरी है.
क्या कहती है द लैंसेट की स्टडी
द लैंसेट में छपी पहली स्टडी बताती है कि किडनी की बीमारी के डायग्नोसिस के लिए अब नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है. अनुमानित ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट (eGFR), एल्ब्यूमिन्यूरिया स्क्रीनिंग, एडवांस्ड इमेजिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और दूसरी मॉडर्न तकनीकें बीमारी का शुरुआती स्टेज में पता लगाने में मदद कर रही हैं. रिसर्चर्स का मानना है कि बीमारी का जितनी जल्दी पता चलेगा, किडनी को उतने ही अच्छे से बचाया जा सकेगा. वहीं, दूसरी स्टडी में एक दिलचस्प बात सामने आई है, जिसमें रिसर्चर्स ने पाया कि किडनी की बीमारी का असर पुरुषों और महिलाओं पर एक जैसा नहीं होता है. किडनी की बनावट, बीमारी का बढ़ना और इलाज पर रिस्पॉन्स दोनों लिंगों में अलग-अलग हो सकता है. इसलिए, भविष्य में किडनी की बीमारी के इलाज को ज्यादा पर्सनलाइज्ड और हर व्यक्ति की जरूरतों के हिसाब से बनाने पर जोर दिया जा रहा है.

