दंतेवाड़ा:- बस्तर दशहरा पर्व का समापन होते ही अब आराध्य देवी आदिशक्ति मां दंतेश्वरी की वापसी यात्रा का शुभ अवसर आ गया है. जगदलपुर में बस्तर दशहरे में शामिल होने के बाद मां दंतेश्वरी आज मंगलवार, 7 अक्टूबर को अपने धाम शक्तिपीठ दंतेवाड़ा लौटेंगी. मां दंतेश्वरी और मां मावली माता की छत्र और पालकी के आगमन की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं. दंतेवाड़ा के ऐतिहासिक शक्तिपीठ मंदिर परिसर में इन दिनों भक्ति और उल्लास का माहौल है. बस्तर अंचल की यह सदियों पुरानी परंपरा हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी पूरे श्रद्धाभाव के साथ निभाई जा रही है.
बस्तर दशहरा से वापस दंतेवाड़ा लौटेंगी दंतेश्वरी माई:माई जी की डोली आज देर रात आंवराभाटा विश्राम स्थली पहुंचेगी. मंदिर प्रबंधन की ओर से बताया गया है कि जगदलपुर से प्रस्थान के बाद डोली का स्वागत मार्ग में जगह-जगह पर श्रद्धालुओं द्वारा किया जाएगा. डोली के आगमन को देखते हुए मंदिर समिति और प्रशासन द्वारा विशेष इंतज़ाम किए गए हैं. सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए रोशनी, पेयजल और चिकित्सा व्यवस्था की भी पूरी तैयारी की गई है.
मां की डोली का होगा भव्य स्वागत: मां की डोली के आगमन के अवसर पर टेंपल स्टेट कमेटी दंतेवाड़ा की ओर से भव्य सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया है. इस कार्यक्रम में रायगढ़ म्यूजिकल ग्रुप के कलाकार मोनू ठाकुर और उनके साथी देवी भक्ति के गीतों की शानदार प्रस्तुति देंगे. समिति के सदस्यों ने सभी नागरिकों और ग्रामीणों से इस जगराता/आर्केस्ट्रा कार्यक्रम में शामिल होकर देवी मां के आशीर्वाद प्राप्त करने का आग्रह किया है.
आंवराभाटा पहुंचने पर शुरु होगा कार्यक्रम: माई जी की डोली रात में आंवराभाटा पहुंचने के बाद जिया डेरा विश्राम स्थल में ठहराव करेगी. अगले दिन यानी 8 अक्टूबर बुधवार की शाम मां दंतेश्वरी की डोली मंदिर के लिए रवाना होगी. रास्ते में कई स्थानों पर डोली को रुकवाकर श्रद्धालु दर्शन करेंगे और माता के जयकारों से पूरा नगर गूंज उठेगा.
परंपरा और आस्था का लगेगा अद्भुत संगम: शारदीय नवरात्र की पंचमी तिथि पर बस्तर राज परिवार की ओर से राजा कमलचंद भंजदेव और राजमाता ने मां दंतेश्वरी को दशहरा उत्सव में शामिल होने का निमंत्रण दिया था. इसके बाद अष्टमी तिथि को मांई जी की डोली जगदलपुर के लिए रवाना हुई थी. मान्यता के अनुसार, मां दंतेश्वरी देवी प्रत्येक वर्ष दशहरे के अवसर पर बस्तर जाती हैं और वहां पूरे क्षेत्र की सुख-समृद्धि के लिए आशीर्वाद देती हैं. वापसी के दौरान माता का डोली यात्रा मार्ग पूरे बस्तर अंचल के लिए उत्सव जैसा होता है. श्रद्धालु घरों के बाहर दीप प्रज्वलित कर माता के स्वागत की तैयारी करते हैं.
बोधराज बाबा से होती है परंपरागत पूजा: मां दंतेश्वरी की डोली जब दंतेवाड़ा नगर की सीमा में प्रवेश करती है, तब सबसे पहले जय स्तंभ चौक स्थित बोधराज बाबा की पूजा-अर्चना की जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, बोधराज बाबा को नगर का संरक्षक माना जाता है. दशहरे के लिए प्रस्थान करने से पहले माई जी उन्हें नगर की रक्षा का दायित्व सौंपती हैं, और वापसी पर दशहरे से लाई गई भेंट बोधराज बाबा को अर्पित करती हैं. इसके बाद मां दंतेश्वरी की डोली भव्य आतिशबाजी, बाजे-गाजे, ढोल-नगाड़ों और देवी भक्ति गीतों के साथ मंदिर में प्रवेश करती है. मंदिर में हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं.
बस्तर की धरोहर: बस्तर दशहरा केवल धार्मिक पर्व नहीं बल्कि लोक संस्कृति, जनआस्था और एकता का अद्भुत संगम है. मां दंतेश्वरी की वापसी यात्रा इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण पल होता है. जहां एक ओर देवी के प्रति अटूट श्रद्धा दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर यह परंपरा बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को भी जीवंत करती है. टेंपल स्टेट कमेटी दंतेवाड़ा के अध्यक्ष ने बताया कि माता के आगमन पर मंदिर परिसर को भव्य रूप से सजाया गया है. सुरक्षा और श्रद्धालुओं की व्यवस्था हेतु प्रशासन और पुलिस विभाग की टीम लगातार निगरानी में रहेगी.
600 साल पुरानी परंपरा का आज भी हो रहा पालन: बस्तर दशहरे की यह परंपरा 600 से अधिक वर्षों पुरानी मानी जाती है. मां दंतेश्वरी, जिन्हें बस्तर की आराध्य देवी कहा जाता है, हर वर्ष राज परिवार के निमंत्रण पर दशहरे में शामिल होती हैं. इस परंपरा में न केवल धार्मिक विश्वास झलकता है बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक एकजुटता का प्रतीक भी है. भक्तों का विश्वास है कि मां दंतेश्वरी की इस यात्रा से अंचल में समृद्धि, सुख और शांति का संचार होता है. यही कारण है कि हर वर्ष हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस अवसर का साक्षी बनने पहुंचते हैं.

