हिंदू धर्म के लोग गणेश चतुर्थी के दिन सिद्धि विनायक गणेश जी का जन्मदिन मनाते हैं. भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है. दस दिनों तक चलने वाला यह त्योहार पूरे भारत में, खासकर महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में मनाया जाता है. हर साल की तरह इस साल भी यह त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जा रहा है. पूरे देश में गणेश उत्सव की धूम शुरू हो गई है. हर कोई अपने घर में विघ्नहर्ता भगवान गणेश को स्थापित करना चाहता है. इसके लिए कुछ विशेष नियम भी बताए गए हैं. आपको बता दें, गणेश चतुर्थी भाद्रपद माह की चतुर्थी को मनाई जाती है.
ज्योतिषाचार्य डॉ. उमाशंकर मिश्र का कहना है कि वैसे तो हर महीने की चतुर्थी पर गणेशजी की पूजा का विधान है, लेकिन भाद्रपद माह की चतुर्थी बेहद विशेष होती है. ऐसी मान्यता है कि इसी दिन सिद्धिविनायक भगवान गणेश प्रकट हुए थे. ज्योतिषाचार्य के मुताबिक, इस दिन भगवान गणेश धरती पर आते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं. दस दिनों तक चलने वाले इस पर्व को लेकर लोगों में गजब का उत्साह देखने को मिलता है.
गणेश उत्सव के अवसर पर, हर जगह मूर्तियां स्थापित की जाती हैं. कुछ लोग घर पर तो कुछ सार्वजनिक स्थानों पर भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करते हैं. इन मूर्तियों में एक खास बात जो मायने रखती है, वह है भगवान गणेश की सूंड. लोगों के मन में यह उलझन रहती है कि भगवान की सूंड किस ओर होनी चाहिए, मूर्ति खड़ी होनी चाहिए या बैठी हुई, साथ में मूषक या ऋद्धि-सिद्धि होनी चाहिए या नहीं. इस लेख के माध्यम से सभी शंकाओं का समाधान किया जाएगा.
दाई सूंड वाले गणेशजी
दाहिनी सूंड वाले गणेश जी को दक्षिणाभिमुखी गणेश या सिद्धि विनायक कहा जाता है, जिनकी पूजा कठिन मानी जाती है और इसके लिए कड़े नियमों और अनुष्ठानों का पालन करना पड़ता है, अन्यथा वे रुष्ट हो सकते हैं. इन्हें शक्ति और सफलता से जोड़ा जाता है और इनकी पूजा से मृत्यु का भय कम होता है तथा आयु और ओज बढ़ता है. ऐसी मूर्तियों की पूजा आमतौर पर मंदिरों में या कठिन साधना करने वाले साधकों द्वारा की जाती है, जबकि गृहस्थों के लिए बाईं सूंड वाले गणेश जी की पूजा अधिक सरल और सुविधाजनक मानी जाती है.
बाई सूंड वाले गणेशजी
यदि मूर्ति के बाईं ओर सूंड मुड़ी हुई हो, तो ऐसी मूर्ति को वक्रतुंड कहते हैं. इनकी पूजा में अधिक नियम नहीं हैं. भगवान गणेश की पूजा सामान्य तरीके से माला-फूल, आरती, प्रसाद चढ़ाकर की जा सकती है. अगर किसी पंडित या पुजारी का मार्गदर्शन न भी हो, तो भी कोई समस्या नहीं है.
गणेश जी की बैठी हुई या खड़ी मुद्रा
शास्त्रों के मुताबिक, गणेश जी की मूर्ति बैठी हुई मुद्रा में ही स्थापित करनी चाहिए. क्योंकि खड़े गणेश को चलायमान माना जाता है. मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा भी बैठे हुए ही की जाती है. जो शास्त्रों के अनुसार, गणेश जी की पूजा बैठकर ही करनी चाहिए, ताकि व्यक्ति की बुद्धि स्थिर रहे.
चूहा और ऋद्धि-सिद्धि
गणेश जी की मूर्ति में, भगवान के नीचे चूहे का होना श्रेष्ठ माना जाता है. वहीं, मूर्ति के साथ ऋद्धि-सिद्धि का होना शुभ माना जाता है.