दुर्ग:- भिलाई स्टील प्लांट में आज बड़ा हादसा हो गया. कोक ओवन यूनिट की बैटरी 5 और 6 नंबर की गैलरी में गिर गया. बताया जा रहा है कि बैटरी गैलरी के स्ट्रक्चर पर गिरा जिससे गैलरी भरभराकर नीचे गिर पड़ी. गनीमत रही कि जहां पर हादसा हुआ वहां पर उस वक्त कोई मौजूद नहीं था. प्लांट प्रबंधन की ओर से हादसे पर अभी तक कुछ नहीं कहा गया है. हादसे वाली जगह को भिलाई स्टील प्लांट ने सील कर दिया है. हादसा कैसे हुआ इसकी जांच की जाएगी.
भिलाई स्टील प्लांट में हादसा: हादसे के बाद प्रभावित जगह पर खोजबीन की गई है. हादसे में किसी के भी हताहत होने या फंसे होने की कोई सूचना नहीं है. हादसे के बाद कोक ओवन यूनिट में प्रोडक्शन पूरी तरह से बंद हो गया है.
कब कब हुए हादसे
15 अप्रैल 2025: ब्लास्ट फर्नेश के पास काम कर रहा ठेका मजदूर झुलस गया.
24 मार्च 2025: कोक ओवन प्लांट में आग लगने से अफरा तफरी मच गई. किसी भी मजदूर को कोई चोट नहीं आई.
6 जनवरी 2025: ब्लास्ट फर्नेस में काम के दौरान आग लग गई. मौके पर फायर ब्रिगेड की गाड़ियों को बुलाना पड़ा. हादसे में कोई जनहानि नहीं हुई.
13 नवंबर 2024: ब्लास्ट फर्नेस में गैस रिसाव से तीन मजदूर घायल हो गये.
10 अक्टूबर 2024: दो क्रेनों के बीच हुई टक्कर से स्टॉपर टूट गया और मजदूर उसकी चपेट में आ गया. मौके पर ही मजदूर की मौत हो गई.
भिलाई स्टील प्लांट की स्थापना कब हुई: भारत को आत्मनिर्भर और विकसित देश बनाने के लिए कल कारखानों की स्थापना की गई. इसी कड़ी में सोवियत संघ और भारत सरकार ने 2 फरवरी, 1955 को नई दिल्ली में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसके अन्तर्गत आरम्भिक 10 लाख टन इस्पात पिण्ड क्षमता का एकीकृत लौह तथा इस्पात कारखाना भिलाई में स्थापित करने का निर्णय किया गया.
कहां लगाया गया इस्पात कारखाना: भिलाई में कारखाना लगाने के के पीछे सबसे बड़ी वजह थी यहां से 90 किलोमीटर दूर डल्ली-राजहरा में लौह अयस्क, 22 किलोमीटर दूर नन्दिनी में चूना-पत्थर तथा 141 किलोमीटर दूर हिर्रि में डोलोमाइट की उपलब्धि थी. 4 फरवरी, 1959 को तात्कालिक राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद ने प्रथम धमन भट्टी प्रज्ज्वलित कर इस कारखाने का उद्घाटन किया. जल्दी ही सितम्बर 1976 में कारखाने का विस्तार कर इसकी क्षमता 25 लाख टन और फिर 1988 में 40 लाख टन कर दी गई. 40 लाख टन क्षमता विस्तार के दौरान सतत् ढलाई यूनिट और प्लेट मिल पर विशेष ध्यान दिया गया. उस समय इस्पात की ढलाई व गढ़ाई के लिए किसी भी एकीकृत इस्पात कारखाने में प्रयोग की जा रही यह सबसे नई टेक्नोलाॅजी थी.