हनुमान जी के रहस्य और उनकी शक्तियां असीम हैं। वे भगवान शिव के रुद्रावतार (11वें रुद्र) हैं, जो माता अंजनी और केसरी के पुत्र होने के साथ-साथ ‘पवनपुत्र’ भी कहलाते हैं। वे अष्टसिद्धि और नवनिधि के दाता हैं, जो चिरंजीवी (अमर) हैं और आज भी भगवान राम की भक्ति में लीन हैं।
हनुमान जी के अनसुने रहस्य, अमरता और वर्तमान उपस्थिति
हनुमान जी चिरंजीवी हैं, यानी वे आज भी जीवित हैं और कलयुग के अंत तक पृथ्वी पर ही रहेंगे। मान्यता है कि गंधमादन पर्वत पर वे निवास करते हैं।
शिव का रुद्रावतार पौराणिक कथाओं के अनुसार, विष्णु जी की मोहिनी छवि को देखने के लिए शिवजी ने जो अवतार लिया, वही हनुमान जी के रूप में प्रसिद्ध हुआ। वे भगवान शिव के रुद्रांश हैं।
अष्टसिद्धि और नवनिधि के स्वामी
हनुमान जी को अष्टसिद्धि और नवनिधि प्राप्त है। वे आकार को छोटा (अणिमा) या बड़ा (महिमा) करने, कहीं भी आने-जाने (प्राप्ति) जैसी शक्तियां रखते हैं।
हनुमान जी से जुड़ा सिंदूर का रहस्य
हनुमान जी के शरीर पर सिंदूर चढ़ाने के पीछे एक कथा है। एक बार माता सीता को मांग में सिंदूर लगाते देख हनुमान जी ने कारण पूछा। सीता माता ने कहा कि इससे श्रीराम की उम्र बढ़ती है। हनुमान जी ने पूरा शरीर सिंदूर से रंग लिया ताकि राम जी की उम्र और भी बढ़ जाए।
राम से भी पहले के भक्त
ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी त्रेतायुग में रामभक्त, द्वापर युग में भीम के भाई (अंजनीपुत्र होने के कारण) और कलयुग में तुलसीदास जी के गुरु के रूप में प्रकट हुए। हनुमान जी न केवल बलवान, बल्कि वेदों के ज्ञाता भी थे।
हनुमान जी ने क्यों धारण किया पंचमुखी रूप
हनुमान जी ने पांच दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और ऊर्ध्व) में राक्षसों का संहार करने के लिए पंचमुखी रूप धारण किया था, जिसमें नृसिंह, गरुड़, वराह, हयग्रीव और हनुमान शामिल हैं। हनुमान जी के इन रहस्यों को जानकर उनके प्रति भक्तों की श्रद्धा और अधिक बढ़ जाती है। उनके भक्त उन्हें संकटमोचन के रूप में पूजते हैं जो हर प्रकार के कष्ट हर लेते हैं।
काले हनुमान जी की क्या है कथा
हनुमान जी का रंग मुख्य रूप से सिंदूरी (लाल) माना जाता है, लेकिन भारत में कई प्राचीन मंदिरों में उनकी काले रंग की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। इन काले हनुमान जी की पूजा विशेष रूप से तेलंगाना (निजामाबाद), राजस्थान (जयपुर), और उत्तर प्रदेश (रायबरेली/रामनगर) में की जाती है।
शनिदेव का प्रभाव: एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब हनुमान जी गुरु दक्षिणा में शनिदेव को सूर्यदेव के पास ला रहे थे, तब शनिदेव की वक्र दृष्टि (क्रोध) के कारण हनुमान जी का रंग काला पड़ गया था।

