नई दिल्ली: 13 वर्षों से कोमा की स्थिति में जीवन बिता रहे गाजियाबाद निवासी हरीश राणा को अब इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) दिए जाने की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है. सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद हरीश राणा को दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती कराया जाएगा, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में उनके शरीर से सभी लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाएगा.
इस मामले में हरीश राणा के परिवार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करने वाले अधिवक्ता मनीष जैन ने बताया कि अदालत के आदेश के मुताबिक, हरीश राणा को उनके घर से एम्स ले जाया जाएगा. अस्पताल में भर्ती करने के बाद डॉक्टरों की एक विशेषज्ञ टीम उनकी स्थिति का परीक्षण करेगी. इसके बाद तय प्रक्रिया के तहत इच्छामृत्यु की प्रक्रिया शुरू की जाएगी.
धीरे-धीरे हटाए जाएंगे सभी उपकरण
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, हरीश राणा के शरीर में जो भी बाहरी जीवन रक्षक उपकरण लगे हुए हैं, उन्हें धीरे-धीरे हटाया जाएगा. इसमें गले में लगी ट्यूब, पेट में लगी फीडिंग ट्यूब व यूरिन कैथेटर जैसे सभी लाइफ सपोर्ट सिस्टम शामिल हैं. ये सभी उपकरण फिलहाल उन्हें कृत्रिम तरीके से जीवित रखने में मदद कर रहे हैं.
अधिवक्ता मनीष जैन ने बताया कि जब इन लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाया जाएगा तो हरीश राणा को प्राकृतिक अवस्था में रखा जाएगा. इसका मतलब यह होगा कि उनके शरीर को किसी भी कृत्रिम चिकित्सा सहायता के बिना सामान्य स्थिति में रहने दिया जाएगा. इसके बाद शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया के अनुसार उनकी स्थिति आगे बढ़ेगी.
अधिवक्ता मनीष जैन के मुताबिक, यह प्रक्रिया पूरी तरह से एम्स के डॉक्टरों की निगरानी में होगी. एम्स के विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम यह सुनिश्चित करेगी कि सभी मेडिकल प्रोटोकॉल और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का पालन किया जाए. इस दौरान मरीज की पूरी तरह से चिकित्सकीय देखरेख की जाएगी. इस प्रक्रिया में कितना समय लगेगा, यह निश्चित नहीं होता है. लाइफ सपोर्ट हटाने के बाद मरीज की मृत्यु तुरंत भी हो सकती है और इसमें कुछ दिन भी लग सकते हैं. यह पूरी तरह से शरीर की स्थिति व प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करता है.
हरीश राणा 13 साल से अचेत अवस्था में
मनीष जैन ने बताया कि हरीश राणा पिछले 13 साल से पूरी तरह अचेत अवस्था में हैं और अपने शरीर का कोई भी हिस्सा खुद से नियंत्रित नहीं कर सकते हैं. वे न तो अपनी इच्छा जाहिर कर सकते हैं और न ही किसी प्रकार की प्रतिक्रिया दे सकते हैं. ऐसे में उनके माता-पिता ने अदालत में याचिका दायर कर उन्हें पीड़ा से मुक्ति दिलाने की मांग की थी.
सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले को सुनने के बाद संवेदनशीलता के साथ फैसला सुनाया और पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी है. यह व्यवस्था ऐसी स्थिति में लागू होती है, जब किसी मरीज को कृत्रिम चिकित्सा उपकरणों के सहारे लंबे समय तक जीवित रखा जा रहा हो और उसके स्वस्थ होने की कोई संभावना न हो.
हरीश राणा के परिवार ने यह भी इच्छा जताई है कि यदि उनकी मृत्यु के बाद उनके कुछ अंग उपयोगी हों तो उनका दान किया जाए. हालांकि यह पूरी तरह डॉक्टरों की जांच पर निर्भर करेगा कि उनके कौन-कौन से अंग प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त हैं.
इस मामले को देश में इच्छामृत्यु से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में से एक माना जा रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद एम्स में होने वाली यह प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी व मेडिकल निगरानी में होगी, ताकि मरीज को गरिमापूर्ण तरीके से अंतिम मुक्ति मिल सके.
क्या है हरीश राणा का मामला
गाजियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा पिछले करीब 13 वर्षों से परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में हैं. वर्ष 2013 में पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान पीजी की चौथी मंजिल से उन्हें किसी ने धक्का देकर नीचे गिरा दिया था, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट लगी. हादसे के बाद से वह पूरी तरह बिस्तर पर हैं और अपने शरीर का कोई हिस्सा नियंत्रित नहीं कर पाते हैं. मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें 100 प्रतिशत क्वाड्रिप्लेजिया (पूरे शरीर में लकवा) है. इतने वर्षों में उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ.
हरीश राणा को सर्जरी से लगाई गई PEG ट्यूब के जरिए क्लिनिकली एडमिनिस्टर्ड न्यूट्रिशन देकर जीवित रखा जा रहा था. उनके माता-पिता ने लंबे समय से चल रही इस स्थिति को देखते हुए अदालत में पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति मांगी थी. सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट व परिवार की सहमति के आधार पर 2018 के कॉमन कॉज फैसले की गाइडलाइन के तहत उन्हें निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है.

