नेचर एनवायरमेंट एंड वाइल्ड लाइफ सोसाइटी के प्रोजेक्ट मैनेजर अभिषेक बताते हैं कि ये सांप वॉल्स करैत प्रजाति का था, जिसे एक असाधारण सांप के रूप में जाना जाता है. सितंबर 2024 से पहले पश्चिम चम्पारण सहित बिहार के ज्यादातर क्षेत्रों में करैत की सिर्फ दो ही प्रजातियां देखी जाती थी, जिनमें कॉमन करैत और बैंडेड करैत शामिल थे. लेकिन अब यहां करैत की कुल 3 प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज की जा चुकी है.
30 वर्षों से वाइल्ड लाइफ पर कार्यरत
अभिषेक बताते हैं कि वो पिछले 30 साल से वाइल्ड लाइफ पर काम कर रहे हैं. वर्तमान में वो मुख्य रूप से पश्चिम चम्पारण जिले में स्थित वाल्मीकि टाइगर रिजर्व और उत्तर प्रदेश के कतर्नियाघाट वाइल्ड लाइफ सेंचुरी पर काम कर रहे हैं. उन्होंने अपने अब तक के कार्यकाल में सांपों की दर्जनों प्रजातियों का सामना किया है. इनमें भारत के चार सबसे जहरीले सांपों (बिग फोर) से लेकर किंग कोबरा जैसे दुनिया के सबसे लंबे जहरीले सांप तक शामिल हैं.
करैत से तीन गुना ज्यादा जहरीला सांप
बकौल अभिषेक, सांपों की विविधता के लिए बिहार के पश्चिम चम्पारण जिले में बसा वाल्मीकि टाइगर रिजर्व बेहद प्रसिद्ध है, लेकिन इसके बावजूद भी यहां आज तक करैत की सिर्फ दो ही प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज की गई है. 21 सितंबर 2024 को सूबे की राजधानी पटना में उन्होंने करैत की ही एक खास प्रजाति का रेस्क्यू किया, जिसे वॉल्स करैत के नाम से जाना जाता है. पहली बार सन 1907 में कर्नल फ्रैंक वॉल्स को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद से इस सांप के तीन अवशेष मिले थे. यही कारण है कि इसे कर्नल वॉल्स के ही नाम से वॉल्स करैत कहा जाने लगा. आश्चर्य की बात यह है कि अन्य सांपों की तुलना में वॉल्स करैत बेहद असाधारण है.
न्यूरोटॉक्सिक जहर से लैस
वॉल्स करैत न्यूरोटॉक्सिक जहर से लैस होते हैं. इनकी एक बाइट से बेहद कम समय में इंसानों की जान जा सकती है. आमतौर पर ये हिमालय की तराई और पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाते हैं. इनकी औसत लंबाई साढ़े चार से पांच फीट तक होती है. ज्यादातर सांपों की तुलना में इनकी त्वचा बेहद चमकीली और धारियों से भरी होती है. हालांकि जमीन से सटा निचला भाग हल्का भूरा और पीले रंग का होता है. भयावह बात यह है कि ये सांप रात में सक्रिय रहते हैं, जो अंधेरा होते ही शिकार की तलाश में बाहर निकलते हैं.
डंसने पर नहीं चलता पता
वैसे तो ये सांप कॉमन करैत से कई गुना ज्यादा जहरीले होते हैं, लेकिन बेहद कम देखे जाने की वजह से इंसानों से इनका सामना ना के बराबर होता है. यही कारण है कि इनके द्वारा डंसे जाने के मामले भी बहुत कम होते हैं. सर्दियों में मार्च से लेकर गर्मियों में मई महीने तक ये बच्चों को जन्म देते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, ये एक बार में 22 अंडे तक देते हैं. चूंकि इनके दांत बेहद छोटे और सुई से भी ज्यादा पतले होते हैं, इसलिए इनके द्वारा डंसे जाने के बावजूद भी जरा भी भनक नहीं लगती और बिना दर्द के कुछ ही समय में तंत्रिका तंत्र खराब होने से इंसान की मौत हो जाती है.